गलतियों से ज्यादा गलत फहमियों और अधिक अपेक्षाओं की वजह से टूटते हैं रिश्ते।

मनुष्य जब किसी से भी भावनात्मक रूप से जुड़ता है तो उनके मध्य एक खूबसूरत रिश्ता कायम हो जाता है और उन रिश्तों के बीच उम्मीदें स्वतः ही जुड़ जातीं हैं फिर जब वह व्यक्ति विशेष उनके उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता है तो हृदय बेवजह ही आहत हो जाता है। चुकीं ऐसे रिश्ते दिल से जुड़े होते हैं और दिल तो स्वयं ही पागल और कमजोर होता है तो वह इस आघात को सहन नहीं कर पाता है ऐसे में दिल टूटने के साथ ही दिल के रिश्ते भी टूटने लगते हैं। ऐसी स्थिति में आवश्यकता होती है सूझबूझ से काम लेने की और ऐसे समय में सबसे बड़ी सलाहकार होती है अपनी मति।
कई बार तो ऐसा होता है कि कोई आहत होता है और दूसरे को इल्म तक नहीं होता क्यों कि कभी-कभी परिस्थितियाँ भी ऐसी बन जाती हैं कि एक दूसरे के मध्य गलत फहमियाँ पैदा हो जाती हैं ।

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लोहरी

लोहड़ी का त्यौहार हिन्दू कैलेंडर के अनुसार पौष माह की आखिरी रात में मनाया जाता है।
यह त्योहार एक तरह से संग्रदियों के जाने और बसंत के मौसम के आने की आहट है। इस दिन अग्नि में फसलों का अंश भी समर्पित किया जाता है। कहा जाता है कि सूर्य और अग्नि जो ऊर्जा के बड़े स्रोत है उन्हें समर्पित है। लोहड़ी की रात सबसे ठंडी मानी जाती है। यह त्योहार मुख्यतः नई फसल की कटाई के मौके पर मनाया जाता है और रात को लोहड़ी जलाकर सभी रिश्तेदार और परिवार वाले पूजा करते हैं। इस मौके पर सभी एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं।

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#एक #चिट्ठी #साहित्यकार #भाइयों #एवम् #बहनों #के #नाम!

प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में भावनाएँ मचलती रहतीं हैं और जैसे ही व्यक्ति शब्दों के माध्यम से उन्हें अभिव्यक्त करने की कला सीख लेता है तो उन्हीं भावनाओं को शब्दों में ढालकर गीत, गज़ल और कविता का रूप दे देता है । और जब सृजन खूबसूरत हो जाता है तो उस सृजन कर्ता को जो तुष्टि का आभास होता है उसे शब्दों में बयाँ करना थोड़ा कठिन जरूर है।

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दूसरा पहलू

एक तरफ समाज की यह बिडम्बना है जहाँ दहेज आदि जैसे समस्याओं को लेकर महिलाएँ ससुराल वालों के द्वारा तरह- तरह से घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं , सिसकती है उनकी जिन्दगी, और कभी कभी तो क्रूरता इतनी चरम पर होती है कि छिन जाती है स्वतंत्रता और सरल भावनाओं के साथ साथ उनकी जिन्दगी भी ! कड़े

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ओल्ड फैशन

स्वछंदता ले रही थी
लज्जा का
साक्षत्कार
सिमटी, सकुचाई सी लज्जा
नयन झुकाये
धीरे से अपने दोनो हाथ जोड़कर बोली
नमस्ते

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गृह लक्ष्मी हूँ

गृह लक्ष्मी हूँ
गृह स्वामिनी हूँ
साम्राज्ञी हूँ और
अपने सुखी संसार में
खुश भी हूँ
फिर भी
असंतुष्ट हूँ स्वयं से

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स्त्री विमर्श

विषय है स्त्री विमर्श
ढूढ रही हूँ शब्द इमानदारी से
कि लिखूं स्त्रियों की असहनीय पीड़ा
दमन , कुण्ठा
कि जी भर कोसूं पुरुषों को
कि जिन पुरूषों को जानती हूँ उन्हें ही
कुछ कहूँ भला बुरा
पर

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