आदर्श बाबू और होशियार बाबू

आदर्श बाबू और होशियार बाबू दोनो में ही वैचारिक भिन्नता होते हुए भी प्रगाढ़ मित्रता थी । हाँ एक समानता थी दोनों में कि दोनों दोनों ही साहित्यकार थे।
जहाँ आदर्श बाबू अपने आदर्श के साथ लेखन में तल्लीन होकर अपनी रचनाधर्मिता का निर्वहन कर रहे थे जिसके फलस्वरूप कभी कभार सम्मानित पत्र पत्रिकाओं में छप जाया करते थे वहीं होशियार बाबू स्थिति परिस्थिति देखते हुए सामन्जस्य बिठाकर जहाँ तहाँ अपना जुगाड़ बैठा ही लेते थे। फलस्वरूप होशियार बाबू के ड्राइंगरूम की आलमारियाँ सम्मानों से सजने लगीं।

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#अस्मिता_पर्व

मन क्षितिज में उमड़ती – घुमड़ती भावनाओं की बदरी हमेशा ही बरसने को आतुर रहतीं हैं और बरस कर वहाँ के जन मानस को तो तृप्त करतीं ही हैं साथ ही उन्हें स्वयं भी तृप्ति का आभास होता है। कुछ ऐसी ही तृप्ति का आभास कथा संग्रह अस्मिता पर्व के लेखक माननीय विनोद कुमार सिंह जी को भी निश्चित ही हुआ होगा जब उन्होंने पुस्तक के नाम के अनुरूप ही खूबसूरत आवरण में सुसज्जित अपने इस कथा संग्रह स्मिता पर्व को अपने हाथों में लिया होगा। फिर भी एक लेखक की आत्मा तब तक पूर्ण तृप्त नहीं होती जब तक कि उसके लेखन को पाठको के द्वारा स्वीकारी और सराही न जाये। और जब संग्रह प्रथम हो तो उद्विग्नता और भी बढ़ जाती है।

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दूल्हा माँगे वोट

बाराती सज – धज चले , दूल्हे हैं बेहाल ।
दूल्हन कुर्सी हाथ में , लिये खड़ी वरमाल।

लिये खड़ी वरमाल, सोचती अपने मन में।
किसकी होगी जीत, स्वयंवर के इस क्षण में।

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माँ

संस्कार तुमने दिया, दिया नया आयाम।
माँ तुम हो सर्वोपरी, शत् शत् तुम्हें प्रणाम।।

माँ तेरा आँचल लगे, सुंदरतम् संसार।
तू ही मेरी गुरु प्रथम, तू ही पहला प्यार।

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