सखि सावन बड़ा सताए रे

सखि सावन बड़ा सताए रे

जबसे उनसे लागि लगन
तन मन में मेरे जागि अगन
नयन करे दिन रैन प्रतीक्षा
अब दूरी सहा नहीं जाए रे
सखि सावन………………..

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शगुन – अपशगुन


मनुष्य कितना भी सख्त, सुलझा हुआ, पढ़ा – लिखा और आधुनिक विचारों का क्यों न हो, अपनों के अनिष्ट की कल्पना मात्र से ही सिहर उठता है और न चाहते हुए भी मानने लगता है टोटके को।
बात करीब दो वर्ष पहले की है।

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आसमान चाहिए

मैं समझती हूँ
तुम्हारे भावनाओं को
तब से
जब से तुमने पूर्ण विश्वास के साथ
मुझे सौप दिये थे
अपना घर ,परिवार
और मैं

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चूड़ियाँ

कितनी मधुर होती हैं
चूड़ियों की खनकार
जिनके मधुर संगीत
मंत्रमुग्ध कर देती हैं
साजन को
खींच लेती हैं उनके
मन की डोर

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बारिश की बूँदें

बारिश की बूंदों ने फिर से, जगा दिया अरमां दिल के।
कर लूँ मैं कुछ बातें मन की, चुपके से उनसे मिल के।
भीग गया सारा जग लेकिन, सूखा सा है मेरा मन।
मुश्किल लगता है अब रहना, अधरों को अपने सिल के।।

जीवन का सत्य

अरे – अरे यह मैं कहाँ आ गई? अपनी हमउम्र श्याम वर्णा तराशे हुए नैन नक्श वाली साध्वी को अपनी खाट के बगल में काठ की कुर्सी पर बैठे हुए देखकर मीना कुछ घबराई हुई सी उससे पूछ बैठी। साध्वी वृक्ष के तना के समान अपनी खुरदुरी हथेली उसके सर पर फेरती हुई बोली बहन घबराओ नहीं तुम सुरक्षित स्थान पर आ गई हो।

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