दलित बाभन

ब्रम्ह की लिखी कहानियाँ तो हमारे आस-पास में बिखरी पड़ी हैं जिसे हुनरमंद लेखनी पन्नों पर उतार कर जन – जन तक पहुँचाने में सफल हो जाती हैं। कुछ ऐसा ही करिश्मा शम्भू पी सिंह जी की लेखनी कर गई है जिसकी बदौलत खूबसूरत तथा रोचक कहानियों का संग्रह दलित बाभन खूबसूरत कवर पृष्ठ में सुसज्जित होकर पाठकों का ध्यान स्वतः ही अपनी ओर आकृष्ट कर रही हैं ।

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भैरवी

आज यूँ ही समाचार पत्र पर साहित्य पेज को पलटा तो एक जानी पहचानी सी खूबसूरत तस्वीर पर मेरी नज़रें ठहर गईं ! फिर नाम मैंने नाम देखा तो भैरवी ! बला की खूबसूरत तो थी ही अब तो भैरवी और भी खूबसूरत लग रही थी इस तस्वीर में ! देखकर तो ऐसा लग रहा था कि यदि सौन्दर्य की प्रतियोगिता रखी जाय और उसकी प्रतिद्वंद्वी मेनका भी हो तो भी प्रथम स्थान भैरवी को ही मिलना तय होता ! मैंने उसकी लिखी गज़ल को कई बार पढ़ा और अपने हृदय में उठे प्रश्नों का उत्तर ढूंढते – ढूंढते स्मृतियों में विचरण करने लगा!

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मंगलसूत्र

जो दीप्ति हमेशा सुहाग चिन्हों का मजाक उड़ाने में जरा भी संकोच नहीं करती थी आज अचानक करवा चौथ के दिन छत पर चाँद को अर्घ्य देते हुए अपनी सहेली कामिनी के सोलह श्रृंगार से सजे हुए रूप लावण्य को देखकर मंत्रमुग्ध हो गई थी ! जब कामिनी हाथ में चलनी लेकर अपने चाँद को निहार रही थी तो तो सच में कामिनी के मुखड़े की दमक के सामने चाँद का भी चमक फीका पड़ गया था ! जब कामिनी का पति अर्नव अपनी पत्नी कामिनी को प्यार से पानी पिलाकर व्रत खोल रहा था तो दीप्ति कामिनी के सौन्दर्य का जादुई रहस्य समझने की कोशिश कर रही थी कि आखिर यह चमत्कार उसके सोलह श्रृंगार की वजह से हुआ या फिर उसके पति के प्यार की वजह से !दीप्ति बार – बार कल्पना के आइना मे निहारती हुई खुद और कामिनी के सौन्दर्य की तुलना करते हुए अतीत में चली गई !

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आई लव यू टू 

अंश क्लास टेस्ट के पेपर पर अपने पापा की साइन करवा कर अपनी क्लास टीचर ज्योति को जैसे ही दिखाया तो ज्योति बार – बार उलट – पुलट कर उस साइन को देखने लगी क्योंकि साइन और नाम दोनो ही कुछ जाना – पहचाना सा लगा उसे !

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सखी पनघट पर मैं नहीं जाऊँगी ,

सखी पनघट पर मैं नहीं जाऊँगी ,
कन्हैया बड़ा छलिया है

बंशी बजाई के मोहे लुभावे
मधुर सुरीला राग सुनावे
खो जाऊँगी बंशी की धुन सुन
अपनी आँखों में सपने बुन
भूली अगर मैं पनिया भरन
तो मैं क्या – क्या बहाना बनाऊँगी
कन्हैया बड़ा…………….

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