कहीं भी कभी भी

कहीं भी, कभी भी, कितनी भी दूर रहती हूँ |
तुम हो यहीं कहीं ऐसा महसूस करती हूँ |
याद करती हूँ तुमको मगर चुपके-चुपके,
तुम्हें आये न हिचकियाँ इसलिए डरती हूँ ||

मुक्तक

अपनी चिट्ठी का अब मैं जवाब मांगूंगी |
कांटे संग ही सही पर गुलाब मांगूंगी |
प्रेम करते हैं कितना वे मुझसे सखी,
अब मैं लिखित में उनसे हिसाब मांगूंगी ||

दया करो माँ

दया करो माँ अम्बे भवानी

बुद्धि का पट खोल दो माँ
वर अपना अनमोल दो माँ
आत्मबोध करवा दो माँ
कि मैं मुर्खा बन जाऊँ सयानी
दया करो माँ………………….

पढ़ना जारी रखें “दया करो माँ”