कहीं भी कभी भी

कहीं भी, कभी भी, कितनी भी दूर रहती हूँ |
तुम हो यहीं कहीं ऐसा महसूस करती हूँ |
याद करती हूँ तुमको मगर चुपके-चुपके,
तुम्हें आये न हिचकियाँ इसलिए डरती हूँ ||

मुक्तक

अपनी चिट्ठी का अब मैं जवाब मांगूंगी |
कांटे संग ही सही पर गुलाब मांगूंगी |
प्रेम करते हैं कितना वे मुझसे सखी,
अब मैं लिखित में उनसे हिसाब मांगूंगी ||

दया करो माँ

दया करो माँ अम्बे भवानी

बुद्धि का पट खोल दो माँ
वर अपना अनमोल दो माँ
आत्मबोध करवा दो माँ
कि मैं मुर्खा बन जाऊँ सयानी
दया करो माँ………………….

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मेरे दिल के तार

मेरे दिल के तार तुमसे जुड़ गये न जाने कैसे ,
हुआ प्रेम मुझको चुपके – चुपके न जाने कैसे |

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सीप के मोती

एक स्त्री की मनःस्थिति तथा अभिव्यक्ति को एक स्त्री ही अच्छी तरह से समझ सकती है क्योंकि कहीं न कहीं स्त्री होने के नाते उन परिस्थितियों से वह भी गुजरी होती हैं…. यही वजह है कि स्त्रियों की अभिव्यक्तियाँ स्त्री हृदय को स्पर्श कर ही लेती हैं !
भावनाओं की बारिश की बूंदें हृदय सीप में संचित हो काव्य रूपी मोती का आकार लेने लगतीं हैं तो लेखनी माला में पिरोने के लिए उत्सुक हो जाती है! वैसे ही लेखिका आशा सिंह जी की लेखनी ने उनकी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पुस्तक में संग्रहित किया है जो कि मुझे उनके द्वारा उपहार स्वरूप प्राप्त हुआ है ! ….. पुस्तक पढ़ने पर यही महसूस हुआ कि वास्तव में लेखिका आशा सिंह जी की अलग अलग भावनाओं के रंगों में एक सौ चार ( 104 ) पृष्ठ में स्पष्ट अक्षरों में संग्रहित यह प्रथम काव्य संकलन सीप के मोती ही तो हैं !

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