प्रेम और इज्ज़त

साहित्य की दुनिया में एक बेहद प्यारा नाम है- किरण सिंह जी का,
स्वभाव से मिलनसार, देखने में सरस्वती, मधुर लेखनी की स्वामिनी के करकमलों द्वारा उनकी तीन पुस्तकें उपहार के रूप में मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात है| पुस्तक मिलते ही सोचा था कि पढ़कर जल्द ही उनपर लिखूँगी| किन्तु अति व्यस्तता के कारण लिख नहीं पायी| इसके लिए मैं किरण जी से क्षमाप्रार्थी हूँ| किन्तु कहते हैं कि विलम्ब हुआ तो एक प्रिय दिन सामने आया, पुस्तक दिवस का…तो बडी ही प्रसन्नता से लिख रही हूँ| उनकी तीन पुस्तकें, प्रीत की पाती (कविता संग्रह), अन्तः के स्वर( दोहा संग्रह) एवं प्रेम और इज्ज़त(कहानी संग्रह) मेरे पास हैं जिसमें मैं कहानी संग्रह के बारे में लिखूँगी|

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कहीं भी कभी भी

कहीं भी, कभी भी, कितनी भी दूर रहती हूँ |
तुम हो यहीं कहीं ऐसा महसूस करती हूँ |
याद करती हूँ तुमको मगर चुपके-चुपके,
तुम्हें आये न हिचकियाँ इसलिए डरती हूँ ||

मुक्तक

अपनी चिट्ठी का अब मैं जवाब मांगूंगी |
कांटे संग ही सही पर गुलाब मांगूंगी |
प्रेम करते हैं कितना वे मुझसे सखी,
अब मैं लिखित में उनसे हिसाब मांगूंगी ||