जो जरुरी है जिंदगी के लिए : मुखरित संवेदनाएँ…

चार दाने अक्षत के, कुछ दूब की पत्तियाँ और एक हल्दी की गाँठ, आँचल में बाँध कर विदा हो रही बेटी की रुलाई के साथ-साथ, कुछ अस्फुट राग भी बनते हैं, कुछ स्वर लहरियाँ भी फूट पड़ती हैं, कुछ कविता सी रच जाती है अपने आप… उसे ही ‘मुखरित संवेदनाएँ’ कहते हैं…
प्रतीक्षारत प्रिया की दो आँखें जब प्रिय के दो कदमों की आहट सुन कर भाव-विह्वल हो उठती हैं तो आँखों की तरलता के साथ वियोग की कसक, सखियों के उलाहने और स्मृतियों में काटे गए पहाड़ जैसे हर क्षण नदी की तरह बह जाने के लिए जिन शब्दों का चुनाव करते हैं उसे ही ‘मुखरित संवेदनाएँ’ कहते हैं…।

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मुखरित संवेदनाएँ

इंद्रधनुषी अनुभूतियों का गुलदस्ता

मुखरित संवेदनाएं, एक लघु लेकिन सारगर्भित कविता संग्रह है जिसमें विभिन्न आयामों तथा रसों की 82 कविताएं समाविष्ट हैं। पुस्तक का पतला कलेवर भ्रामक है क्योंकि इसके एक-एक शब्द वजनदार हैं, अनुभूतियों का सटीक प्रकटीकरण करते हैं तथा कम स्थान में ढ़ेर सारी बातें उड़ेलती है। शब्द चित्र उकेड़ती रचनाएं अपने भीतर विराट अर्थबोघ समेटे है। ये कविताएं वस्तुतः बारिश की भाँति बरसती तो बाहर हैं लेकिन अंतर्मन को भी अपनी फुहारों से भिगों देती है। शब्दों का चयन और वाक्य विन्यास प्रभावी है।

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भोला और चन्दन

कुछ अपरिचित लोगों से भी अपनापन महसूस होने लगता है तथा मन में अनायास ही उनके लिए सम्मान का भाव उत्पन्न हो जाता है और हम खुद भी नहीं समझ पाते हैं कि ऐसा क्यों? कुछ ऐसी ही व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं आदरणीया आशा सिंह जी !
जैसे ही उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक भोला और चंदन { लघु उपन्यास} भेंट स्वरूप मुझे प्राप्त हुई मैं उसे लेकर पढ़ने बैठ गई ! और पढ़ने के पश्चात मुझे जो अनुभूति हुई उसे आप सभी से साझा किये बिना रहा नहीं गया !

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एक पाठक की पाती कवयित्री के नाम

श्रद्धेय कवयित्री
सादर चरण स्पर्श !
मैं कुशल हूँ I आशा करता हूँ आप भी सपरिवार सकुशल होंगी I आज मुझे आपके द्वारा सस्नेह भेंट स्वरुप भेजा गया आपकी दूसरी काव्य संग्रह की प्रति मेरे अभिभावक तुल्य परम आदरणीय उप महाप्रबंधक महोदय के द्वारा प्राप्त हुई I काव्य संग्रह का शीर्षक पढ़कर मुझे भी पाती के रूप में अपनी भावनाओं को लिखने की इच्छा हुई I मै विज्ञान का छात्र हूँ अतः ऐसे गंभीर विषय प्रेम के सम्बन्ध में लिखने पर अज्ञात भय भी है कि कहीं शब्दों के चयन में कोई भूल न हो जाय I कहीं प्रेम की लौकिक व्याख्या में भूल न हो जाए I मेरे द्वारा किसी पुस्तक के विषय में पहली समीक्षा है अतः अनजाने में हुई गलती के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ I आपके जीवन में सुख, सौभाग्य, समृधि तथा शांति की अमृत वर्षा हो I आपके अच्छे स्वास्थ्य की कामना I दोनों पुत्रों को भी उज्जवल भविष्य की कामना,वे सार्वजनिक जीवन के उच्च शिखर को प्राप्त करें I

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घर में सभी बड़ों को मेरा प्रणाम और छोटों को शुभ आशीर्वाद I
आपका अनुज
(राजेश कुमार पाण्डेय )

महान कवयित्री श्रीमति किरण सिंह की दूसरी काव्य रचना प्रीत की पाती जैसे हीं सस्नेह भेंट स्वरुप प्राप्त हुई कार्यालय से आने के तुरंत बाद पढ़ने लगा I सुंदर आकर्षक आवरण तथा काव्य संग्रह का शीर्षक पढ़ने की उत्कट इच्छा पैदा करती है I विज्ञान का छात्र होने के कारण कहीं – कहीं कविताओं का भाव समझने में कठिनाई भी हुई I कवयित्री की कविता मेरे जैसे संवेदनशील तथा भावुक पाठक को कॉलेज के दिनों में भी ले गयी Iकवयित्री ने इस समाज को देने के लिए स्वस्थ और स्वतंत्र राह खोजी है I आपने हर चुनौती को अवसर में बदला है तथा अपने अन्तःकरण की सच्चाई से एक मिशाल बनकर उभरी हैं I
भाषा बड़ी हीं चुटीली , साफ –सुथरी और भावानुकूल हैं I मुझे प्रतीत होता है कि जीवन में प्रेम और कविता की लहरें एक साथ आती हैं I कुछ सौभाग्शाली उन्हें गिरफ्तार कर लेते हैं I मानव जीवन में कविता और प्रेम पर्यायवाची हैं I काव्य संग्रह के प्रारंभ में हीं अपने पति को समर्पित कवितायेँ
साँसों की सरगम तुम ही,
ह्रदय झंकृत संगीत हो I
उपर्युक्त पंक्तियाँ कवयित्री के प्रेम की पराकाष्ठा ,समर्पण एवम सुसंस्कृत उच्च आदर्शों को दर्शाती है I
सास्वत सनातन प्रेम की अद्भूत सजीव चित्रण प्रस्तुत करती, त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति तथा भारतीय वैदिक समाज में वैवाहिक संबंधों की सफल, सहज और सार्थक व्याख्या भी इन पंक्तियों में परिलक्षित होती है –
पूर्ण हो जाये आराधना आपकी,
बाती सी मैं दीपक की जलती रही I
कविताओं में कई जगह आंचलिक बोली के शब्द कविताओं को और भी रोचक बनाते हैं I अनेक कविताओं में ममत्व और स्नेह की झलक भी देखी जा सकती है I
मैं तो बाती हूँ मुझे स्वीकार है जलना
जलाओ प्रेम का दिया , बुझने नहीं दूँगी
इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे यही समझ में आया कि प्रेम जीवन है, प्रेम सर्वस्व है, प्रेम निराकार है, प्रेम सास्वत सनातन है, प्रेम मुखरित संवेदनाएँ की ही परिणति है, प्रेम ही जीवन का आधार है , प्रेम ही जीवन का सार्थक उद्देश्य है तथा प्रेम ही मानव जीवन की सार्थकता है I
यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो कवितायेँ भी किसी बिम्ब का हीं प्रतिबिम्ब है I कवयित्री की शब्दों में इशारे हैं ,संकेत हैं, और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी है I
कवयित्री की कुछ रचनाओं के साथ ऐसा हो सकता है कि वे विशेष निजी पलों में रचित हो जिसकी पूरी जानकारी कवयित्री को हीं हो I ऐसा भी हो सकता है कि मुझ जैसे अबोध पाठक की समझ से परे हो I
बूँद स्वाति की भावना , हृदय सीप है मीत I
प्रेम रत्न मोती सदृश , बना काल नवनीत I I
प्रेम रस से सनी हुई कविताओं में एक स्वाभाविक प्रवाह, लय तथा गेय भी हैं I प्रेम में पूर्ण समर्पण एक ओर जहाँ आकर्षक रूप में विचार –पक्ष को उभारती है , वही पठनीयता का पक्ष भी समृद्ध रूप में सामने आता है I मेरा ऐसा मानना है कि कवयित्री की रचनाएँ एक जागरण है I कविताओं में प्रेम की पराकाष्ठ तथा पूर्ण समर्पण है तो दूसरी तरफ यथार्थ जीवन की सजगता भी है I गीत – गीतिका –मुक्तक –संग्रह प्रीत की पाती पठनीय तथा संग्रहणीय भी है I

राजेश कुमार पांडेय

Executive er S B P D C L

जब तुम याद आये

बसंत का आगमन हो चुका था ! कोयल की कूक के संग बासंती बयार धीरे-धीरे गुनगुनाती हुई सम्पूर्ण वातावरण संगीतमय कर रही थी और साथ ही छू छू कर कुछ कह रही थी स्पर्श और सुगंध जानी पहचानी सी थी ऐसे में डाकिया दरवाजे की घंटी बजा कर हांथ में थमाया था एक लिफाफा जिसपर नाम भी कुछ जानी पहचानी सी ही थी ! लिफाफा खोलते ही एक खूबसूरत कवर पृष्ठ से सुसज्जित पुस्तक मेरे हांथो में थी !

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हम बात कर रहे हैं सुप्रसिद्ध लेखिका प्रियंवदा अवस्थी जी के अनमोल काव्य संग्रह जब तुम याद आये भाग (1) की जो 80 पृष्ठों में संग्रहित है ! सबसे पहले तो पुस्तक के कवर पृष्ठ पर ही लेखिका के खूबसूरत चित्र उनके नाम तथा कर्म को चरितार्थ करती है जो पाठक के मन को पहली ही नजर में अपनी तरफ आकृष्ट करने में सक्षम है !
जीवन पथ पर चलते चलते मिल जाते हैं अनेक पथिक ! कुछ साथ चलते हैं कुछ छूट जाते हैं और कुछ आगे निकल जाते हैं तथा कुछ हमारे स्मृति पटल पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं जिनकी स्मृतियाँ हमारे अन्तर्मन में अंकित हो जाती हैं ! उन मधुर स्मृतियों में कभी मिलन की खुशी से मन मयूर नर्तन करने लगता है तो कभी बिछुड़ने की विरह वेदना स्मृति पटल पर कुंडली मारे सर्प की तरह व्याघात करती रहती हैं ! तब उमड़ने लगती हैं भावनाएँ छलक पड़ते हैं नयनों से अश्रुधार कभी खुशी में तो कभी गम में भी जिसमें संवेदनशील कविताकारा अपनी लेखनी को डुबोकर अपनी संवेदनाओं को आकार देने की सराहनीय कोशिश की हैं तथा स्मृतियों को पन्नों पर उतारते हुए गढ़ दी हैं काव्य श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही भाव को बहुत ही कुशलता पूर्वक !
जैसा कि लेखिका ने अपनी बात में ही बताई कि वर्षो बाद उनकी लेखनी चल पड़ी और काव्य ने श्रृंगार ओढ़ लिया ! सच में कविता पढ़ते हुए उन भावनाओं के सागर में मन डूब जाता है और एक अलग ही आनंद का संचार करता है !
संकलन की पहली ही कविता पढ़कर लेखिका के भाव तथा शब्द संयोजन उनके विदूषी होने को प्रमाणित करता है !

एक बार फिर
उससे हुआ मेरा सामना
और इस बार
मैने कहा – शिव
उसने कहा – सुन्दर
मैनें कहा – शक्ति
उसने कहा – श्रेष्ठ
अब मैनें कहा – सत्य
उसने कहा – सृष्टि

संवेदनशील मन तो हमेशा ही कुछ न कुछ गढ़ता ही रहता है यूँ ही कभी-कभी जैसा कि बहुत ही सहज भाव से लेखिका ने अपनी एक कविता में कहा है !

मैं तो यूँ ही बेवक्त और बेबात लिखा करती हूँ
जेहन में उतर गये खयालात लिखा करती हूँ

लेखिका प्रीत रंग में इतनी रंग गई हैं कि उन्हें सिर्फ प्रीत का ही रंग सच्चा और बाकी रंग कच्चा लगता है……
सांचा रंग मोरी प्रीत
रंग सबरे हैं कांचे
पियु आ जाओ अब देश
चुनर फागुन रंग राचे

लेखिका के रचनाओं में सम्पूर्ण समर्पण का भाव देखने को मिलता है ! उन्हें प्रेम में चोट भी सहर्ष स्वीकार है उनका कोमल मन अचानक सशक्त होकर पीर सहने को तैयार हो जाता है जो प्रेम में अक्सर ही उपहार स्वरूप मिल ही जाता है !
करो चोट देखूं
कि अब और कितनी
इस पीर की और
चरम है कहाँ तक
तो कहीं प्रतीक्षा में विकल हो जाती हैं और कहती हैं
तुमसे ये दूरी सही नहीं जाती
और पास होते तो कही नहीं जाती

कहीं पर खूबसूरत सी गुजारिश करती हैं
नहीं चाहिये मुझे मोक्ष…
तुम्हारे प्रेम से
आजाद कर देना मुझे
इस हवा की तरह
जिसमें घुलकर मैं रच बस जाऊँ
हर उस पगडंडी पर
जहाँ जहाँ तुम अपने पांव रखो

वे प्रीतम से कहती हैं
बांधों ऐसी डोर नयन की
प्रीत पतंग गगन झूमे
अरमानों के पंख लगा हम
धरती और गगन चूमे

लेखिका भारतीय संस्कृति और सभ्यता को अपनी कविताओं में जीती हुई अपने प्रीतम को ही ईश्वर मानती हैं और कहती हैं
मंदिर मंदिर क्यों भटकूं
जब तुम हृदय विराजे
रग रग तन्मय प्रेम तुम्हारे
भाल तुम्हीं हो साजै

उनकी कविताओं में सम्पूर्ण समर्पण का भाव तो दिखता ही है साथ ही अपने स्त्री के सहनशक्ति का गर्व भी दिखाई देता है ! वो दिखाती हैं कि हम भी उसी धरा की संतान हैं जहाँ माता सीता जैसी पूजनीया ने जन्म लिया था !
वो कहती हैं
सहती रहूंगी मैं अथक निश्छल
युगों युगों तक
नियति है मेरी
कदाचित् प्रकृति भी
और कभी-कभी जीवन के थपेड़ों को सहते सहते परेशान हो जाती हैं तो माँ की याद आ जाती है और फिर लिखती हैं
आज झूला झुलाओ न माँ
मुझको पहलू सुलाओ न माँ
क्यूँ थकी जा रही है दुलारी

और फिर साहस बटोर कर नव आशा की किरणें उनकी आँखों में दिखाई देती हैं और कहती हैं
वो चमक उठी आँखों आँखों में
और मुस्काई
एक व्यंगात्म चेतना के साथ
बालों को झटके बोली
उम्मीद बटोरती हूँ
बोलो खरीदोगे…?

कुल मिलाकर श्रृंगार रस में भीगी इस संग्रह की रचनाएँ पाठकों के मन को भी पूरी तरह भिगो देती हैं इसलिए हम कह सकते हैं कि यह एक पठनीय एवं संग्रहणीय काव्य संग्रह है जिसका मूल्य भी मात्र ( 110 रूपये ) पृष्ठ के हिसाब से बिल्कुल सही है!

जब तुम याद आये भाग – ( 1 )
लेखिका – प्रियंवदा अवस्थी
प्रकाशक – रत्नाकर प्रकाशन, इलाहाबाद

किरण सिंह

सीप के मोती

एक स्त्री की मनःस्थिति तथा अभिव्यक्ति को एक स्त्री ही अच्छी तरह से समझ सकती है क्योंकि कहीं न कहीं स्त्री होने के नाते उन परिस्थितियों से वह भी गुजरी होती हैं…. यही वजह है कि स्त्रियों की अभिव्यक्तियाँ स्त्री हृदय को स्पर्श कर ही लेती हैं !
भावनाओं की बारिश की बूंदें हृदय सीप में संचित हो काव्य रूपी मोती का आकार लेने लगतीं हैं तो लेखनी माला में पिरोने के लिए उत्सुक हो जाती है! वैसे ही लेखिका आशा सिंह जी की लेखनी ने उनकी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पुस्तक में संग्रहित किया है जो कि मुझे उनके द्वारा उपहार स्वरूप प्राप्त हुआ है ! ….. पुस्तक पढ़ने पर यही महसूस हुआ कि वास्तव में लेखिका आशा सिंह जी की अलग अलग भावनाओं के रंगों में एक सौ चार ( 104 ) पृष्ठ में स्पष्ट अक्षरों में संग्रहित यह प्रथम काव्य संकलन सीप के मोती ही तो हैं !

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मेरे मन के गीत ( ओम दोहा चालीसा )

बिना ईश्वरीय कृपा के कुछ भी सम्भव नहीं है ऐसा हम सभी सुनते आये हैं ! यह सत्य भी है, क्योंकि हम सभी के जीवन में कुछ न कुछ कल्पना से भी परे अचानक ऐसा कुछ चमत्कार हो जाता है कि नास्तिक भी आस्तिक होने पर विवश हो जाता है ! और साहित्य सृजन तो बिना माँ वीणा वादिनी की कृपा के सम्भव ही नहीं है यह अनुभूति तो मुझे है ही लेकिन विदूषी अनुजा शुचि भवि द्वारा रचित मेरे मन के गीत पढ़कर यह विश्वास और भी अटूट हो गया कि अवश्य ही शुचि पर माँ शारदे की कृपा हुई है तभी वह अद्भुत, अद्वितीय, अनुपम तथा उत्कृष्ट सृजन कर पाई है जो निश्चित ही आध्यात्म के प्रति उदासीन रवैया अपनाये हुए युवा पीढ़ी को आध्यात्म की तरफ़ रुझान बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में कामयाब होगी !

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