प्रीत की पाती की समीक्षा

समीक्षा

कृति- प्रीत की पाती (कविता संग्रह)

कवयित्रीः किरण सिंह संपर्कः 9430890704

प्रकाशकःवातायन, पटना समीक्षकः प्रभात कुमार राय

पृष्ठः 120 मूल्यः 200रू0 मो0ः 9934083444

प्रीत की पाती दुबले-पतले कलेवर (मात्र 120 पृष्ठों में) में है लेकिन बहुत ही सारगर्भित है। शब्दों का चयन प्रवीणता से किया गया है तथा कवयित्री अपनी विशिष्ट शैली की छाप कविताओं में छोड़ी है। ‘प्रीत की पाती’ कोई रंग-बिरंगी ख्वाहिशें नहीं है- यह स्त्री के जीवन संघर्ष को रूपात्रित करती है। पुरूष के लिए नारीत्व अनुमान है पर नारी के लिए अनुभव। राष्ट्रकवि दिनकर जी का मानना र्है

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प्रीत की पाती

आदरणीया सादर प्रणाम.

आपकी दोनो पुस्तकें पढ़ा . आपकी सभी रचनायें मधुर सरल बोधगम्य . हैं आपकी भाषा बिल्कुल सहजगम्य है । एसा बिल्कुल नही लगता कि आप नई कवियित्री हैं ।कम शब्दों मे बड़े ही सरल भाषा मे बहुत बड़ा भाव कह देती हैं । आपने जो अनुभव किया वही लिखा।”मिले सुकून दिल को मै इसलिए लिखती हूं . कभी समझोगे मुझे मै इसलिए लिखती हूँ .” आपके ह्रदय का अथाह प्रेम आपकी सभी रचनाओं मे उछालें मारता है । किन्तु प्रेम की पवित्रता भी आपकी सात नही कई जन्मो तक की स्थाई सम्पत्ति है।

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मेरे हमदम

जीवन पथ पर चलते – चलते अचानक कोई ऐसा पथिक मिल जाता है जिनसे लगता है मानो हम चिरकाल से परीचित हों | उसका सानिध्य सुखद लगने लगता है! जिसके आभास मात्र से हृदय में प्रेम की चिंगारी प्रस्फुटित होने लगती है! जिस पर अपना सर्वस्व समर्पित कर अधूरेपन में सम्पूर्णता प्राप्त कर सुरक्षा की अनुभूति करता है मन ! वही होता है हमारा सच्चा हमदम ! और अपने हमदम को विषय बनाकर जो सृजन हुआ हो सही मायने में वही सम्पूर्ण कविता है!

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प्रीत की पाती की समीक्षा

हर कविता की अपनी एक विशिष्ट धरा तथा एक कहानी होती है जिस पर भावनाओ का अकुरन होता है। कल्पनाओं के अजब गजब उपवन में रस छंद अलंकारों की कितनी ही शाखें और कितने पत्ते बना देता है मन । मरुस्थल में भी जल की बूंदों की बौछारें गिरा जाती हैं कविताएं।
ऐसा ही कुछ आदरणीया सखी किरण सिंह जी का नवीनतम काव्य संग्रह #प्रीतकीपाती पढ़ते समय प्रतीत हुआ ।
जो मुझे कुछ समय पूर्व उनके द्वारा उपहार स्वरूप मिला ।

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दिल से बस यूँ ही

अक्सर ही हमारे हृदय सागर में भावनाओं और संवेदनाओं की लहरें उथल पुथल कर किनारे की आस में अपना सर पटकती रहती हैं! हृदय की वेदना या तो आँखों से अश्रु के रूप में झर कर स्वयं को समाप्त कर लेती हैं या फिर अभिनय कला से छुपा लेती हैं! पर लेखनी उन अश्रुओं में डूबकर चाहे वे खुशी के हों या फिर गम के उनकी वकालत कर उन एहसासों को न्याय दिला ही देती है जो अक्सर ही निकल ही जाते हैं दिल से बस यूँ ही!

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जो जरुरी है जिंदगी के लिए : मुखरित संवेदनाएँ…

चार दाने अक्षत के, कुछ दूब की पत्तियाँ और एक हल्दी की गाँठ, आँचल में बाँध कर विदा हो रही बेटी की रुलाई के साथ-साथ, कुछ अस्फुट राग भी बनते हैं, कुछ स्वर लहरियाँ भी फूट पड़ती हैं, कुछ कविता सी रच जाती है अपने आप… उसे ही ‘मुखरित संवेदनाएँ’ कहते हैं…
प्रतीक्षारत प्रिया की दो आँखें जब प्रिय के दो कदमों की आहट सुन कर भाव-विह्वल हो उठती हैं तो आँखों की तरलता के साथ वियोग की कसक, सखियों के उलाहने और स्मृतियों में काटे गए पहाड़ जैसे हर क्षण नदी की तरह बह जाने के लिए जिन शब्दों का चुनाव करते हैं उसे ही ‘मुखरित संवेदनाएँ’ कहते हैं…।

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मुखरित संवेदनाएँ

इंद्रधनुषी अनुभूतियों का गुलदस्ता

मुखरित संवेदनाएं, एक लघु लेकिन सारगर्भित कविता संग्रह है जिसमें विभिन्न आयामों तथा रसों की 82 कविताएं समाविष्ट हैं। पुस्तक का पतला कलेवर भ्रामक है क्योंकि इसके एक-एक शब्द वजनदार हैं, अनुभूतियों का सटीक प्रकटीकरण करते हैं तथा कम स्थान में ढ़ेर सारी बातें उड़ेलती है। शब्द चित्र उकेड़ती रचनाएं अपने भीतर विराट अर्थबोघ समेटे है। ये कविताएं वस्तुतः बारिश की भाँति बरसती तो बाहर हैं लेकिन अंतर्मन को भी अपनी फुहारों से भिगों देती है। शब्दों का चयन और वाक्य विन्यास प्रभावी है।

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