डाॅ सीताबो बाई

सिताबो बाई

युग चाहे कोई भी हो सीता को तो अग्नि परीक्षा से गुजरना ही पड़ता है। क्योंकि आँसू, प्रेम और बलिदान से इतिहास लिखती हुई पुरुषों को श्रेष्ठ बताने वाली स्त्री ही भारतीय संस्कृति तथा परम्पराओं के मानकों पर खरी उतरती है। ऐसे में रीतियों की बेड़ियों में जकड़ना ही स्त्रियाँ अपनी किस्मत मान कर उसे तोड़ने का साहस नहीं जुटा पातीं। क्योंकि उन्हें लक्षमण रेखा को लांघने का परिणाम पता होता है।

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#अस्मिता_पर्व

मन क्षितिज में उमड़ती – घुमड़ती भावनाओं की बदरी हमेशा ही बरसने को आतुर रहतीं हैं और बरस कर वहाँ के जन मानस को तो तृप्त करतीं ही हैं साथ ही उन्हें स्वयं भी तृप्ति का आभास होता है। कुछ ऐसी ही तृप्ति का आभास कथा संग्रह अस्मिता पर्व के लेखक माननीय विनोद कुमार सिंह जी को भी निश्चित ही हुआ होगा जब उन्होंने पुस्तक के नाम के अनुरूप ही खूबसूरत आवरण में सुसज्जित अपने इस कथा संग्रह स्मिता पर्व को अपने हाथों में लिया होगा। फिर भी एक लेखक की आत्मा तब तक पूर्ण तृप्त नहीं होती जब तक कि उसके लेखन को पाठको के द्वारा स्वीकारी और सराही न जाये। और जब संग्रह प्रथम हो तो उद्विग्नता और भी बढ़ जाती है।

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बागवान

#बागवान नाम सुनते ही हमारे आँखों के सामने हेमामालिनी और अमिताभ बच्चन की फिल्म आँखों के सामने घूमने लगती है। वाकई इस फिल्म की पटकथा बहुत ही हृदय स्पर्शी और मार्मिक है जिसको बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है।
प्रायः फिल्मों और कहानियों में किसी एक पक्ष को नायक तथा दूसरे पक्ष को खलनायक दिखा दिया जाता है जो कि पूर्ण सत्य नहीं होता है। और जहाँ सवाल बुजुर्गों का आता है तब तो समूचे युवा पीढ़ी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है चाहे वह कितनी ही समस्याओं से जूझ क्यों न रहीं हों।

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पुस्त_समीक्षा-वैविध्य

जीवन सफर में बहुत से उतार – चढ़ाव आते हैं जिन्हें तय करते समय हमारे मन वाटिका में तरह-तरह के भावनाओं के कुसुम पल्लवित और पुष्पित होते रहते हैं जिन्हें चुन – चुन कर लेखक – लेखिकाओं तथा कवि एवम् कवयित्रियों की मालिन लेखनी पिरोकर वर्ण माला का आकार देती है। कुछ यूँ ही कवयित्री रश्मि सिंह जी की लेखनी ने बहुत ही खूबसूरती से विविध प्रकार के शब्द सुमनो को चुन – चुन कर काव्य माला तैयार किया है जिसका नाम है वैविध्य। रश्मि सिंह जी द्वारा रचित प्रथम काव्य संग्रह संग्रह का वैविध्य नाम वास्तव में उनकी रचनाओं के हिसाब से बहुत ही सटीक है

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जनता दरबार

हमारे आसपास के वातावरण में कई तरह की घटनाएँ घटित होती रहतीं हैं जिसे देखकर या सुनकर हमारा संवेदनशील मन कभी हर्षित होता है तो कभी व्यथित और फिर कभी अचंभित भी। और फिर हम मानव के स्वभावानुरूप अपने अपनो, इष्ट मित्रों, पड़ोसियों आदि से उस घटना की परिचर्चा करके अपनी मचलती हुई संवेदनाओं को शांत करने का प्रयास करते हैं। किन्तु एक लेखक का मन सिर्फ परिचर्चा करने मात्र से शान्त नहीं होता बल्कि उसकी तो नींद चैन सब छिन जाती हैं। घटनाएँ सोते – जागते मस्तिष्क पटल पर मंडराने लगतीं हैं, लेखनी मचलने लगती है, शब्द चहकने लगते हैं और फिर लिखी जाती हैं कहानियाँ। शायद ऐसा ही कुछ घटित हुआ होगा वरिष्ठ कथाकार शम्भू पी सिंह जी के इर्द – गिर्द और उनकी लेखनी चल पड़ी होगी। वैसे उन्होंने अपने उत्तर कथन में इस बात को स्वयं स्वीकारा भी है कि देखी सुनी घटनाओं ने शब्द दिये और कथा का प्रवाह बना रहे इसलिए कल्पना का भी सहारा लिया।

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रोशनी के दीप

जब – जब मन अन्तर्द्वन्द्ध के गहन तिमिर में घिर जाता है तब-तब भावनाओं और संवेदनाओं की तिल्लियाँ स्वतः ही हृदय से टकराकर प्रस्फुटित करतीं हैं चेतना चिनगी , तभी झिलमिलाने लगते हैं सृजन के दीप , रौशन हो जाता है अन्तः जो करना चाहता है विश्व समाज को ज्योतिर्मय। बनकर रौशनी के दीप।

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पुस्तक समीक्षा – प्रेम और इज्जत

मानव मन की सबसे कोमल भावनाओं में से एक है प्रेम | देवता दानव पशु पक्षी कौन है जिसने इसे महसूस ना किया हो | कहा तो ये भी जाता है कि मनुष्य में देवत्व के गुण भी प्रेम के कारण ही उत्पन्न होते हैं | परन्तु विडंबना ये है कि जिस प्रेम की महिमा का बखान करते शास्त्र थकते नहीं वही प्रेम स्त्री के लिए हमेशा वर्जित फल रहा है | उसे प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं है |

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