बेटे के विवाह में खर्च के लिए दहेज की आवश्यकता क्यों

अपने बेटे के विवाह का आमन्त्रण कार्ड लेकर एक परीचित पति – पत्नी हमारे घर आए ! चूंकि बेटे का विवाह था तो खुश होना स्वाभाविक ही था जो उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था! वैसे भी हमारे यहाँ बेटे के विवाह में तो बेटे के माँ बाप के पाँव जमीन पर ही नहीं पड़ते सो वे परीचित भी अपने साथ – साथ अपने बेटे की प्रशंसा के साथ-साथ विवाह कैसे तय किये, कैसी लड़की है आदि का विस्तृत विवरण सुनाए जा रहे थे और हम उनकी बातों को सत्य नारायण भगवान की कथा की भांति सुने जा रहे थे! अब बेटे के बाप थे तो आत्मप्रशंसा करना भी तो स्वाभाविक ही था !

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सपोर्ट

करीब दस वर्षो के बाद मेरे मोवाइल पर अचानक एक काॅल आया! आवाज़ तो कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी फिर भी ठीक – ठीक नहीं पहचान पाई फिर उसने बताया कि मैं अमिता हूँ और अब तुम्हारे ही शहर में आ गई हूँ , मतलब मेरे पति का ट्रांसफर पटना में ही हो गया है यह सुनकर मेरा तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा… हो भी क्यों न..? आखिर वह मेरी सहपाठिनी थी , उसपर भी उसने जब बताया कि मम्मी भी आई हैं तब तो और भी खुशी हुई और मिलने की लालसा और भी बढ़ने लगी थी “क्योंकि उसकी मम्मी मेरी काॅलेज की प्रिंसिपल थीं! इसलिए मैं उन्हें खाने पर आमंत्रित किये बिना नहीं रह सकी !

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टाइम है मम्मी


जॉब के बाद ऋषि पहली बार घर आ रहा था..!कुछ छःमहीने ही हुए होंगे किन्तु लग रहा था कि छः वर्षों के बाद आ रहा है ऋषि घर ! बैंगलोर से आने वाली फ्लाइट पटना में ग्यारह बजे लैंड करने वाली थी.पर मेरे पति को रात भर नींद नहीं आई ! ! कई बार ऋषि से बात करते रहे कब चलोगे.. थोड़ा जल्दी ही घर से निकलना..सड़क जाम भी हो सकती है……हाँ आई कार्ड लेना मत भूलना.. आदि आदि..और उधर से ऋषि की आवाज़ आती पापा अब मैं बच्चा नहीं रहा… आप अभी तक मुझे बच्चों की ही तरह ही ट्रीट कर रहे हैं “अभी आराम से सोइये ना आप..और पति देव मोवाइल रख कर टीवी पर न्यूज वगैरह में अपने को उलझाने लगे थे, उस समय तो उनका वश चलता तो रात भर एयरपोर्ट पर ही जाकर बैठे रहते…. उनकी इस बेचैनी को देखते हुए मैंने थोड़ा चुटकी लेते हुए ही उनसे कहा चले जाइए ना रात में ही एयरपोर्ट..फिर वे सोने की कोशिश करते ” लेकिन नींद आये तब तो सोते..इधर उधर के खटर पटर से मैं भी ठीक से नहीं सो पायी थी..!

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13 फरवरी 206

बात फरवरी सन 2006 की है। मेरी तबियत अचानक खराब हो गई। डाक्टर को दिखाने के बाद रिपोर्ट आया कि मेरे हृदय के वाल्व में छेद है। तब घर में देखने वालों की भीड़ लग गई थी। सभी अपने-अपने अनुभव के आधार पर हमे सुझाव दे रहे थे। तभी एक मेरे फैमिली डाॅक्टर आये और मेरे पति से बोले कि आप किसी की मत सुनिये। इंडिया में सभी डॉक्टर और वकील बन जाते हैं। और हाँ मैं तो देख लिया अब आप इन्हें दिल्ली ले जाइये क्योंकि मेरा मानना है कि डाक्टर, वकील और ताला में कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए।
उनका सुझाव मानकर मेरे पति मुझे दिल्ली ले गये और डाॅक्टर के कहे अनुसार निर्धारित तिथि पर मुझे स्कार्ट हर्ट हास्पिटल में भर्ती करा दिये ।
तब वेदना पिघल कर मेरे आँखों से छलकने को आतुर थीं, पलकें अश्रुओं को सम्हालने में खुद को असहाय महसूस कर रही थी, मेरा जी चाह रहा था कि कोई अकेला कुछ देर के लिए मुझे छोड़ दे ताकि मैं जी भर कर रो लूँ । फिर भी अभिनय कला में निपुण अधर मुस्कुराने में सफल हो रहे थे क्योंकि उन्हें बहादुरी का खिताब जो मिला था ! फिर कैसे कोई समझ सकता था कि मेरे होठों को मुस्कुराने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ रहा था…! किसी को क्या पता था कि सर्जरी से पहले सबसे हँस हँस कर मिलना और बच्चों के साथ घूमने निकलना , रेस्तरां में मनपसंद खाना खाते समय मेरे हृदय के पन्नों पर मस्तिष्क लेखनी बार बार एक पत्र लिख लिख कर फाड़ रही थी कि मेरे जाने के बाद…!

ग्यारह फरवरी २००६ रात करीब आठ बजे बहन का फोन आया.पति ने बात करने के लिए कहा तब आखिरकार छलक ही पड़े थे नयनों से नीर और रूला ही दिए थे मेरे पूरे परिवार को। नहीं सो पाई थी उस रात को मैं। क्योंकि सुबह मेरा ओपेन हार्ट सर्जरी होना था। सुबह-सुबह नर्स और एक मेल कर्मचारी स्ट्रेचर लेकर आये और उसपर मुझे लेटा कर कुछ दूर ले गये लेकिन कुछ ही दूर चलने के बाद स्ट्रेचर को वापस लेकर आये कि सर्जरी आज नहीं होगा।उसके बाद तो कुछ लोगों ने अफवाह भी फैला दिया कि डॉक्टर नरेश त्रेहान इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देखने के लिए पाकिस्तान जा रहे हैं। तब मुझे तोऊसर्जरी से यूँ ही डर लग रहा था इसलिए मुझे एक बहाना मिल गया था हॉस्पिटल से भागने का। गुस्सा तो आ ही रहा था तो चिल्ला पड़ी मैं । उसके बाद डॉक्टरों की टीम आ पहुंची थी मुझे समझाने के लिए तभी डॉक्टर नरेश त्रेहान भी आये और मुझे समझाने लगे कि मुझे इमर्जेंसी में बाहर जाना पड़ रहा और आपका केस काफी क्रिटिकल है इसलिए मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रेजेन्स में ही आपकी सर्जरी हो.! तब मुझे उनकी बातों पर विश्वास हो गया।
१३ फरवरी 2006 सुबह करीब ९ बजे स्कार्ट हार्ट हॉस्पिटल की नर्स ने जब स्ट्रेचर पर लिटाया और ऑपरेशन थियेटर की तरफ ले जाने लगी थी तो मुझे लग रहा था कि जल्लाद रुपी परिचारिकाएं मुझे फांसी के तख्ते तक ले जा रही हैं, हृदय की धड़कने और भी तेजी से धड़कने लगीं थी , मन ही मन मैं सोंच रही थी शायद यह मेरे जीवन का अन्तिम दिन है इसलिए जी भर कर देखना चाहती थी दुनिया को, पर नजरें नहीं मिला पा रही थी परिजनों से कि कहीं मेरी आँखें छलककर मेरी पोल न खोल दें..मैं खुद को बिलकुल निर्भीक दिखाने का अभिनय कर रही थी उस समय !
परिचारिकाएं ऑपरेशन थियेटर के दरवाजे के सामने स्ट्रेचर रोक दीं . और तभी किसी यमदूत की तरह डाक्टर आ गये .. स्ट्रेचर के साथ साथ डॉक्टर भी ऑपरेशन थियेटर में मेरे साथ चल रहे थे। चलते – चलते वे अपनी बातों में उलझाने लगे थे मुझे जैसे किसी चंचल बच्चे को रोचक कहानी सुनाकर बातों बातों में उलझा लिया जाता है.. !
डाक्टर ने कहा किरण जी लगता है आप बहुत नाराज हैं हमसे .! मैने कहा हाँ क्यों न होऊं…? और मैं हॉस्पिटल की व्यवस्था को लेकर कुछ कुछ उलाहने.देने लगी थी . तथा इसी प्रकार की कुछ कुछ बातें किये जा रही थी..!
डर तो मुझे खूब लग रहा था क्योंकि एक औरत ने मुझसे कहा था कि आपरेशन होश में ही होगा तो सोचा कि यही वक्त है डाक्टर से पूछ ही लूँ और मैने डाक्टर से पूछा बेहोश करके ही ऑपरेशन होगा न..? डाक्टर ने मजाकिया अंदाज में कहा अब मैं आपका होश में ही ऑपरेशन करके आपपर एक नया एक्सपेरिमेंट करता हूँ और यूँ ही बातों ही बातों में डॉक्टर ने मुझे बेहोशी का इंजेक्शन दे दिया उसके बाद मुझे क्या हुआ कुछ याद नहीं..!

करीब ३६ घंटे बाद १४ फरवरी को मेरी आँखें रुक रुक कर खुल रही थीं ..! आँखें खुलते ही सामने पतिदेव को खड़े देखा तब .मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि मैं सचमुच जीवित हूँ…!कहीं यह स्वप्न तो नहीं है यह सोचकर मैने अपने पति की तरफ अपना हाँथ बढ़ाया। जब पति ने मेरा हाथ पकड़ा तब विश्वास हुआ कि मैं सचमुच जीवित हूँ..! तब मैं भूल गई थी उन सभी शारीरिक और मानसिक यातनाओं को जिन्हे मैंने सर्जरी के पूर्व झेला था ..! उस समय जिन्दगी और भी खूबसूरत लगने लगी थी। .वह हास्पीटल के रिकवरी रूम का वेलेंटाइन डे सबसे खूबसूरत दिन लग रहा था मुझे ..!
अपने भाई , बहनों , सहेलियों तथा सभी परिजनों का स्नेह.., माँ का अखंड दीप जलाना……, ससुराल में शिवमंदिर पर करीब ११ पंडितों द्वारा महामृत्युंजय का जाप कराना। पिता , पति , और पुत्रों के द्वारा किया गया प्रयास… कैसे मुझे जाने देते इस सुन्दर संसार से..! वो सभी स्नेहिल अनुभूतियाँ मेरे नेत्रों को आज भी सजल कर रही हैं …. मैं उसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर पा रही…हूँ !
आज मुझे डॉक्टर देव , नर्स देवी , और स्कार्ट हार्ट हास्पिटल एक मंदिर लगता है..!
मुझे यही अनुभव हुआ कि समस्याओं से अधिक मनुष्य एक भयानक आशंका से घिर कर डरा होता है और ऐसी स्थिति में उसके अन्दर नकारात्मक भाव उत्पन्न होने लगता है जो कि सकारात्मक सोंचने ही नहीं देता है….. उसके ऊपर से हिन्दुस्तान में सभी डॉक्टर ही बन कर सलाह देने लगते हैं….!
मैं अपने अनुभव के आधार पर यही कहना चाहती हूं कि स्वारथ सम्बन्धित समस्याओं के समाधान हेतु डॉक्टर के परामर्श पर चलें , विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है इसलिए भरोसा रखें डाॅक्टर पर , आत्मविश्वास के लिए ईश्वर पर भी भरोसा रखें , और सबसे पहले डॉक्टर और हास्पिटल का चयन में कोई समझौता न करें .!

कलियुग में भी होते हैं श्रवण कुमार

अबतक तक हम घरों की विशेष साफ सफाई दीपावली से पहले लक्ष्मी जी के स्वागतार्थ करते आये हैं किन्तु काबिले तारीफ हैं आज की पीढ़ी जो अपने पेरेंट्स के स्वागतार्थ उनके आने की सूचना पाते ही घरों की साफ सफाई में लग जाते हैं ! धन्य हैं वे माता पिता जिनकी सन्ताने उन्हें इतना मान देतीं हैं! उन धन्य माताओं में से एक मैं भी हूँ!

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