एकौ साधे सब सधै, सब साधे सब खोय

मानव मन बड़ा चंचल होता है। एक पाया नहीं कि दूसरे को पाने की इच्छा जागृत हो जाती है। इसलिये उसे साधित करना बहुत कठिन कार्य है।

बात कुछ चौबीस – पच्चीस वर्ष पूर्व की है। तब मुझे किसी कार्यक्रम के लिए सितार पर पाँच राग अच्छी तरह से तैयार करना था। मेरे गुरु जी हफ्ते भर से एक ही राग ( बहार ) का कभी रजाखानी गत तो कभी मसीतखानी गत के स्थाई, अन्तरा, आरोह, अवरोह, पकड़ पर बार – बार तबले के संगत के साथ अभ्यास करवाये जा रहे थे जब कि राग अच्छी तरह से तैयार हो गया था।

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ढूंढते – ढूंढते

बहुत याद आती है गीता की! सन 1981, में नवी कक्षा से ही हम दोनों की दोस्ती हुई थी ! गीता बला की खूबसूरत थी इसीलिए शायद नज़र बचाने के लिए ईश्वर ने उसके नाक पर एक तिल लगा दिया था साथ ही पढ़ने में भी अव्वल थी इसलिए हर कोई उससे दोस्ती करना चाहता था लेकिन मैं खुश नसीब थी इसलिये वो मेरी पक्की सहेली बन गई ! हमारी दोस्ती की चर्चा पूरे स्कूल में थी कुछ लड़कियों को तो इर्ष्या भी होती थी हमारी दोस्ती को देखकर !

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अमित

ऋषि के जाॅब के बाद पहली बार जब मैं बैंगलोर गई थी तो घर में घुसते ही मुझे कुछ अच्छा लगा फिर भी मेरी नजरें अपनी स्वाभावानुसार घर का निरीक्षण करने ही लगीं थी लेकिन इसबार घर काफी साफ सुथरा तथा सुव्यवस्थित था फिर भी चमचमाते हुए फर्श के कोनों तथा खिड़कियों और दरवाजों पर जमी कहीं – कहीं धूल की परतें मेरी नज़रें ढूढ ही लीं लेकिन उस दिन मैंने तारीफ किया क्योंकि मुझे पिछली बातें याद थीं जब मैं ऋषि के ( जब स्टूडेंट था) घर जाते ही सफाई अभियान में लग जाती थी तब ऋषि बहुत परेशान हो जाता था क्योंकि मैं जितना ही घर के सदस्यों की फूहड़ता से परेशान रहती हूँ उससे कहीं अधिक पतिदेव और बच्चे मेरी सफाई से परेशान रहते हैं !

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परमानन्द की प्राप्ति

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वैसे तो मेरे पिता से मेरी अनेकों वार्तालाप हुई जो काफी शिक्षाप्रद, प्रेरणादायी,एवं आदर्श जीवनशैली से परिपूर्ण होती थी .! परन्तु उनसे हुई मेरी अन्तिम वार्तालाप जीवन और मृत्यु के मध्य कई प्रश्न छोड़ गये जिनका उत्तर मैं बार – बार ढूढने की नाकामयाब कोशिश करती रहती हूँ..

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बीस पैसा

हमारे लिए गर्मी की छुट्टियों में हिल स्टेशन तथा सर्दियों में समुद्री इलाका हमारा ननिहाल या ददिहाल ही हुआ करता था! जैसे ही छुट्टियाँ खत्म होती थी हम अपने ननिहाल पहुंच जाया करते थे जहाँ हमें दूर से ही देख कर ममेरे भाई बहन उछलते – कूदते हुए तालियों के साथ गीत गाते हुए ( रीना दीदी आ गयीं…… रीना दीदी……..) स्वागत करते थे कोई भाई बहन एक हाथ पकड़ता था तो कोई दूसरा और हम सबसे पहले बाहर बड़े से खूबसूरत दलान में बैठे हुए नाना बाबा ( मम्मी के बाबा ) को प्रणाम करके उनके द्वारा पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देकर अपनी फौज के साथ घर में प्रवेश करते थे!

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बेटे के विवाह में खर्च के लिए दहेज की आवश्यकता क्यों

अपने बेटे के विवाह का आमन्त्रण कार्ड लेकर एक परीचित पति – पत्नी हमारे घर आए ! चूंकि बेटे का विवाह था तो खुश होना स्वाभाविक ही था जो उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था! वैसे भी हमारे यहाँ बेटे के विवाह में तो बेटे के माँ बाप के पाँव जमीन पर ही नहीं पड़ते सो वे परीचित भी अपने साथ – साथ अपने बेटे की प्रशंसा के साथ-साथ विवाह कैसे तय किये, कैसी लड़की है आदि का विस्तृत विवरण सुनाए जा रहे थे और हम उनकी बातों को सत्य नारायण भगवान की कथा की भांति सुने जा रहे थे! अब बेटे के बाप थे तो आत्मप्रशंसा करना भी तो स्वाभाविक ही था !

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सपोर्ट

करीब दस वर्षो के बाद मेरे मोवाइल पर अचानक एक काॅल आया! आवाज़ तो कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी फिर भी ठीक – ठीक नहीं पहचान पाई फिर उसने बताया कि मैं अमिता हूँ और अब तुम्हारे ही शहर में आ गई हूँ , मतलब मेरे पति का ट्रांसफर पटना में ही हो गया है यह सुनकर मेरा तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा… हो भी क्यों न..? आखिर वह मेरी सहपाठिनी थी , उसपर भी उसने जब बताया कि मम्मी भी आई हैं तब तो और भी खुशी हुई और मिलने की लालसा और भी बढ़ने लगी थी “क्योंकि उसकी मम्मी मेरी काॅलेज की प्रिंसिपल थीं! इसलिए मैं उन्हें खाने पर आमंत्रित किये बिना नहीं रह सकी !

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