अमित

ऋषि के जाॅब के बाद पहली बार जब मैं बैंगलोर गई थी तो घर में घुसते ही मुझे कुछ अच्छा लगा फिर भी मेरी नजरें अपनी स्वाभावानुसार घर का निरीक्षण करने ही लगीं थी लेकिन इसबार घर काफी साफ सुथरा तथा सुव्यवस्थित था फिर भी चमचमाते हुए फर्श के कोनों तथा खिड़कियों और दरवाजों पर जमी कहीं – कहीं धूल की परतें मेरी नज़रें ढूढ ही लीं लेकिन उस दिन मैंने तारीफ किया क्योंकि मुझे पिछली बातें याद थीं जब मैं ऋषि के ( जब स्टूडेंट था) घर जाते ही सफाई अभियान में लग जाती थी तब ऋषि बहुत परेशान हो जाता था क्योंकि मैं जितना ही घर के सदस्यों की फूहड़ता से परेशान रहती हूँ उससे कहीं अधिक पतिदेव और बच्चे मेरी सफाई से परेशान रहते हैं !

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परमानन्द की प्राप्ति

वैसे तो मेरे पिता से मेरी अनेकों वार्तालाप हुई जो काफी शिक्षाप्रद, प्रेरणादायी,एवं आदर्श जीवनशैली से परिपूर्ण होती थी .! परन्तु उनसे हुई मेरी अन्तिम वार्तालाप जीवन और मृत्यु के मध्य कई प्रश्न छोड़ गये जिनका उत्तर मैं बार – बार ढूढने की नाकामयाब कोशिश करती रहती हूँ..!

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बीस पैसा

हमारे लिए गर्मी की छुट्टियों में हिल स्टेशन तथा सर्दियों में समुद्री इलाका हमारा ननिहाल या ददिहाल ही हुआ करता था! जैसे ही छुट्टियाँ खत्म होती थी हम अपने ननिहाल पहुंच जाया करते थे जहाँ हमें दूर से ही देख कर ममेरे भाई बहन उछलते – कूदते हुए तालियों के साथ गीत गाते हुए ( रीना दीदी आ गयीं…… रीना दीदी……..) स्वागत करते थे कोई भाई बहन एक हाथ पकड़ता था तो कोई दूसरा और हम सबसे पहले बाहर बड़े से खूबसूरत दलान में बैठे हुए नाना बाबा ( मम्मी के बाबा ) को प्रणाम करके उनके द्वारा पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देकर अपनी फौज के साथ घर में प्रवेश करते थे!

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बेटे के विवाह में खर्च के लिए दहेज की आवश्यकता क्यों

अपने बेटे के विवाह का आमन्त्रण कार्ड लेकर एक परीचित पति – पत्नी हमारे घर आए ! चूंकि बेटे का विवाह था तो खुश होना स्वाभाविक ही था जो उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था! वैसे भी हमारे यहाँ बेटे के विवाह में तो बेटे के माँ बाप के पाँव जमीन पर ही नहीं पड़ते सो वे परीचित भी अपने साथ – साथ अपने बेटे की प्रशंसा के साथ-साथ विवाह कैसे तय किये, कैसी लड़की है आदि का विस्तृत विवरण सुनाए जा रहे थे और हम उनकी बातों को सत्य नारायण भगवान की कथा की भांति सुने जा रहे थे! अब बेटे के बाप थे तो आत्मप्रशंसा करना भी तो स्वाभाविक ही था !

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सपोर्ट

करीब दस वर्षो के बाद मेरे मोवाइल पर अचानक एक काॅल आया! आवाज़ तो कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी फिर भी ठीक – ठीक नहीं पहचान पाई फिर उसने बताया कि मैं अमिता हूँ और अब तुम्हारे ही शहर में आ गई हूँ , मतलब मेरे पति का ट्रांसफर पटना में ही हो गया है यह सुनकर मेरा तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा… हो भी क्यों न..? आखिर वह मेरी सहपाठिनी थी , उसपर भी उसने जब बताया कि मम्मी भी आई हैं तब तो और भी खुशी हुई और मिलने की लालसा और भी बढ़ने लगी थी “क्योंकि उसकी मम्मी मेरी काॅलेज की प्रिंसिपल थीं! इसलिए मैं उन्हें खाने पर आमंत्रित किये बिना नहीं रह सकी !

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टाइम है मम्मी

जॉब के बाद ऋषि पहली बार घर आ रहा था..!कुछ छःमहीने ही हुए होंगे किन्तु लग रहा था कि छः वर्षों के बाद आ रहा है ऋषि घर ! बैंगलोर से आने वाली फ्लाइट पटना में ग्यारह बजे लैंड करने वाली थी.पर मेरे पति को रात भर नींद नहीं आई ! ! कई बार ऋषि से बात करते रहे कब चलोगे.. थोड़ा जल्दी ही घर से निकलना..सड़क जाम भी हो सकती है……हाँ आई कार्ड लेना मत भूलना.. आदि आदि..और उधर से ऋषि की आवाज़ आती पापा अब मैं बच्चा नहीं रहा… आप अभी तक मुझे बच्चों की ही तरह ही ट्रीट कर रहे हैं “अभी आराम से सोइये ना आप..और पति देव मोवाइल रख कर टीवी पर न्यूज वगैरह में अपने को उलझाने लगे थे, उस समय तो उनका वश चलता तो रात भर एयरपोर्ट पर ही जाकर बैठे रहते…. उनकी इस बेचैनी को देखते हुए मैंने थोड़ा चुटकी लेते हुए ही उनसे कहा चले जाइए ना रात में ही एयरपोर्ट..फिर वे सोने की कोशिश करते ” लेकिन नींद आये तब तो सोते..इधर उधर के खटर पटर से मैं भी ठीक से नहीं सो पायी थी..!

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13 फरवरी 206

वेदना पिघल कर आँखों से छलकने को आतुर थीं.. पलकें अश्रुओं को सम्हालने में खुद को असहाय महसूस कर रही थीं…जी चाहता था कि कोई अकेला कुछ देर के लिए छोड़ तो देता कि जी भर के रो लेती.. फिर भी अभिनय कला में निपुण अधर मुस्कुराने में सफल हो रहीं थीं ..बहादुरी का खिताब जो मिला था उन्हें….! कैसे कोई समझ सकता था कि होठों को मुस्कुराने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ रहा था…! किसी को क्या पता था कि सर्जरी से पहले सबसे हँस हँस कर मिलना और बच्चों के साथ घूमने निकलना , रेस्तरां में मनपसंद खाना खाते समय मेरे हृदय के पन्नों पर मस्तिष्क लेखनी बार बार एक पत्र लिख लिख कर फाड़ रही थी कि मेरे जाने के बाद…!

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