शगुन – अपशगुन


मनुष्य कितना भी सख्त, सुलझा हुआ, पढ़ा – लिखा और आधुनिक विचारों का क्यों न हो, अपनों के अनिष्ट की कल्पना मात्र से ही सिहर उठता है और न चाहते हुए भी मानने लगता है टोटके को।
बात करीब दो वर्ष पहले की है।

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बड़ी बहु

वैसे तो हम शहर में रहते थे लेकिन हमारी गर्मी की छुट्टियाँ हमेशा ही नानी या दादी के घर यानि गाँवों में बीतती थीं । मैं जब भी गाँव जाती तो वहाँ के सभी छोटे – बड़े ममेरे – चचेरे भाई – बहन मुझे घेर लेते और मैं उस छोटी सी सेना की सेनापति बनकर कभी कभी कित – कित तो कभी अन्त्यक्षरी या या फिर आइस – पाइस खेलती। गाँव के सभी भाई बहन बहुत मुझे प्यार करते थे इसलिए जब मैं वापस आने लगती थी तो सभी बहुत रोते थे।

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एकौ साधे सब सधै, सब साधे सब खोय

मानव मन बड़ा चंचल होता है। एक पाया नहीं कि दूसरे को पाने की इच्छा जागृत हो जाती है। इसलिये उसे साधित करना बहुत कठिन कार्य है।

बात कुछ चौबीस – पच्चीस वर्ष पूर्व की है। तब मुझे किसी कार्यक्रम के लिए सितार पर पाँच राग अच्छी तरह से तैयार करना था। मेरे गुरु जी हफ्ते भर से एक ही राग ( बहार ) का कभी रजाखानी गत तो कभी मसीतखानी गत के स्थाई, अन्तरा, आरोह, अवरोह, पकड़ पर बार – बार तबले के संगत के साथ अभ्यास करवाये जा रहे थे जब कि राग अच्छी तरह से तैयार हो गया था।

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ढूंढते – ढूंढते

बहुत याद आती है गीता की! सन 1981, में नवी कक्षा से ही हम दोनों की दोस्ती हुई थी ! गीता बला की खूबसूरत थी इसीलिए शायद नज़र बचाने के लिए ईश्वर ने उसके नाक पर एक तिल लगा दिया था साथ ही पढ़ने में भी अव्वल थी इसलिए हर कोई उससे दोस्ती करना चाहता था लेकिन मैं खुश नसीब थी इसलिये वो मेरी पक्की सहेली बन गई ! हमारी दोस्ती की चर्चा पूरे स्कूल में थी कुछ लड़कियों को तो इर्ष्या भी होती थी हमारी दोस्ती को देखकर !

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अमित

ऋषि के जाॅब के बाद पहली बार जब मैं बैंगलोर गई थी तो घर में घुसते ही मुझे कुछ अच्छा लगा फिर भी मेरी नजरें अपनी स्वाभावानुसार घर का निरीक्षण करने ही लगीं थी लेकिन इसबार घर काफी साफ सुथरा तथा सुव्यवस्थित था फिर भी चमचमाते हुए फर्श के कोनों तथा खिड़कियों और दरवाजों पर जमी कहीं – कहीं धूल की परतें मेरी नज़रें ढूढ ही लीं लेकिन उस दिन मैंने तारीफ किया क्योंकि मुझे पिछली बातें याद थीं जब मैं ऋषि के ( जब स्टूडेंट था) घर जाते ही सफाई अभियान में लग जाती थी तब ऋषि बहुत परेशान हो जाता था क्योंकि मैं जितना ही घर के सदस्यों की फूहड़ता से परेशान रहती हूँ उससे कहीं अधिक पतिदेव और बच्चे मेरी सफाई से परेशान रहते हैं !

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परमानन्द की प्राप्ति

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वैसे तो मेरे पिता से मेरी अनेकों वार्तालाप हुई जो काफी शिक्षाप्रद, प्रेरणादायी,एवं आदर्श जीवनशैली से परिपूर्ण होती थी .! परन्तु उनसे हुई मेरी अन्तिम वार्तालाप जीवन और मृत्यु के मध्य कई प्रश्न छोड़ गये जिनका उत्तर मैं बार – बार ढूढने की नाकामयाब कोशिश करती रहती हूँ..

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बीस पैसा

हमारे लिए गर्मी की छुट्टियों में हिल स्टेशन तथा सर्दियों में समुद्री इलाका हमारा ननिहाल या ददिहाल ही हुआ करता था! जैसे ही छुट्टियाँ खत्म होती थी हम अपने ननिहाल पहुंच जाया करते थे जहाँ हमें दूर से ही देख कर ममेरे भाई बहन उछलते – कूदते हुए तालियों के साथ गीत गाते हुए ( रीना दीदी आ गयीं…… रीना दीदी……..) स्वागत करते थे कोई भाई बहन एक हाथ पकड़ता था तो कोई दूसरा और हम सबसे पहले बाहर बड़े से खूबसूरत दलान में बैठे हुए नाना बाबा ( मम्मी के बाबा ) को प्रणाम करके उनके द्वारा पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देकर अपनी फौज के साथ घर में प्रवेश करते थे!

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