आदर्श बाबू और होशियार बाबू

आदर्श बाबू और होशियार बाबू दोनो में ही वैचारिक भिन्नता होते हुए भी प्रगाढ़ मित्रता थी । हाँ एक समानता थी दोनों में कि दोनों दोनों ही साहित्यकार थे।
जहाँ आदर्श बाबू अपने आदर्श के साथ लेखन में तल्लीन होकर अपनी रचनाधर्मिता का निर्वहन कर रहे थे जिसके फलस्वरूप कभी कभार सम्मानित पत्र पत्रिकाओं में छप जाया करते थे वहीं होशियार बाबू स्थिति परिस्थिति देखते हुए सामन्जस्य बिठाकर जहाँ तहाँ अपना जुगाड़ बैठा ही लेते थे। फलस्वरूप होशियार बाबू के ड्राइंगरूम की आलमारियाँ सम्मानों से सजने लगीं।

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आई हैव अ प्राब्लम

तब मैं फेसबुक पर नई नई आई थी। मदर्स डे था और सभी फेसबुक फ्रेन्ड्स के बेटे – बेटियाँ बड़े ही खूबसूरत और प्यारे शब्दों में शुभकामनाएँ दे रहे थे जिसे पढ़कर मुझे खुशी तो बहुत हो रही थी लेकिन कहीं न कहीं मेरे मन के कोने में भी एक चाहत थी कि काश मेरे बेटे भी मुझे ऐसी ही कुछ शुभकामनाएँ भेजते।

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मन्नत

ओपेन हार्ट सर्जरी के बाद कुछ परिजन इष्ट – मित्र मुझसे मिलने आ रहे थे तो कुछ फोन पर ही हाल चाल पूछ लेते थे लेकिन मेरी सबसे पक्की सहेली साधना का न तो काॅल आया और न ही वह खुद ही आई जिस वजह से मैं अन्दर ही अन्दर काफी दुखी रहने लगी थी और मेरी आँखें हमेशा ही साधना के लिए ही प्रतीक्षारत।

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