श्याम सलोने आओ जी

हे श्याम सलोने आओ जी
अब तो तुम दरस दिखाओ जी

आओ मधु वन में मुरलीधर
प्रीत की बंशी बजाओ जी

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लालिमा फिर छा रही है

लालिमा फिर छा रही है,
शाम ढलकर आ रही है |

चन्द्रमा से कर सगाई ,
चाँदनी इतरा रही है!

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उचर रहा छज्जे पर कागा

उचर रहा छज्जे पर कागा , कोयलिया सुर में गाई है |
जानी पहचानी सी खुशबू , लेकर पुरवाई आई है |

घड़ी दो घड़ी चैन न आवै, द्वारे बार बार मैं जाऊँ |
शायद साजन ने मुझको फिर , कोई चिट्ठी पिठवाई है |

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वादा करती हूँ तुझसे

वादा करती हूँ तुझसे निभाया करूंगी,
रोज सपनों में तेरे मैं आया करूंगी |

मैं अपनी कहूंगी और तेरी सुनूंगी,
यूँ ही दिल अपना बहलाया करूंगी |

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पहली बार

पहली बार उनका आना मुझे याद है सखी |
खट से कुंडी खटखटाना मुझे याद है सखी |

खोली दरवाजा तो सामने वे मिले,
नज़रों का टकराना मुझे याद है सखी ||

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महसूस करती हूँ

महसूस करती हूँ तुम्हें कितना कि तुमसे क्या कहूँ |
पड़ न जाये शब्द कहीं कम मैनें न सोचा कहूँ |

लिखकर उर के पन्नों पर अधरो को मैने सी लिया,
तुम तो समझते हो मुझे मैं न कहूँ या हाँ कहूँ!

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बिदाई की घड़ियाँ

जब भी याद आतीं बिदाई की घड़ियाँ |
भर आतीं हैं मेरी आँसू से अँखियाँ ||

बीता था बचपन जिस आँगन में मेरा |
कैसे भूल जाऊँ वो नैहर की गलियाँ |

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