दिखता तू ही तू है

कभी सूरज कभी चन्द्रमा की तरह,
दिखता तू ही तू है खुदा की तरह |

उठी नज़रें मेरी जब भी जिस तरफ़ ,
तुझे पाया वहाँ कान्हा की तरह |

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टूट गई तंद्रा

टूट गई तंद्रा जो पग थाप से ,
हृदय का है नाता मेरा आपसे |

रुकी जो थीं सांसें फिर चलने लगीं,
सजन आपके नाम के जाप से |

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आदत नहीं है

दर्दे दिल को जताने की आदत नहीं है,
बेवजह यूँ सताने की आदत नहीं है |

छोड़ देती मैं भी बात करना मगर,
मुझे रूठ जाने की आदत नहीं है |

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दी जो खुदा ने

दी जो खुदा ने हमें जिंदगी
चलो हम उसी की करें बंदगी

गिला है हमें कोई उससे अगर
प्रथम साफ दिल की करें गंदगी

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प्यार से वे मुझे

प्यार से वे मुझे बहलाने लगे
कसम फिर से वे मेरी खाने लग

रूठने का हुनर मैंने सीखा नहीं
लेकिन वे मुझे फिर मनाने लगे

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उम्र हो चाहे कोई भी

उम्र हो चाहे कोई भी प्यार करना लाजिमी है |
हो जरूरी तैर दरिया पार करना लाजिमी है ||

जो उन्हें तकलीफ़ हो तकलीफ मेरी देखकर तो |
मुस्कुराकर दर्द में श्रृंगार करना लाजिमी है ||

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लज्जा की अपनी घूंघट

लज्जा की अपनी घूंघट मैं खोलूँ कैसे?
मुझे तुमसे प्यार कितना है बोलूँ कैसे?

हो रहा है नीचे ऊपर ये प्रेम का है पलड़ा,
कौन करता प्यार कितना मैं तोलूँ कैसे?

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