भगवती देवी 

हाँ भगवती देवी बिल्कुल सटीक नाम है उनका क्यों कि कहाँ बोलतीं हैं भगवती देवियाँ , कहाँ सोचतीं हैं भगवती, कहाँ रोती हैं , देवियाँ! उन्हें तो ज़रा सा अक्षत, फूल, माला, फल, मिठाई चढ़ा दो , खा लो , और फिर बाँट दो उन्हें तो प्रसन्न होकर आशिर्वाद देना ही है क्यों कि वह देवी जो ठहरीं ! अपना धर्म तो निभाना ही होगा उन्हें न? साथ ही अपने नाम तथा यश कीर्ति का खयाल भी रखना होगा !

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ज्वैलरी

भतीजे की शादी में आने के लिए भैया – भाभी ने ज्यों ही न्योता भेजा मेरे तो सपनों के पंख लग गये! इन्हीं मांगलिक कार्यक्रमों में तो सभी रिश्ते – नातेदारों से मिलना हो पाता है! मौसी, चाची, बुआ, बहनें, सखियाँ, सहेलियाँ सभी एक साथ, एक जगह साथ में गाना – बजाना सोच – सोच कर मन रोमांचित हुआ जा रहा था ! साथ ही क्या पहनना है क्या गिफ्ट करना है

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विल यू मैरी मी..?

शिखा नई नई फेसबुक ज्वॉइन की थी ! सभी फेसबुक फ्रेंड्स की तस्वीरों पर हजारों की संख्या में लाइक्स कमेंट्स देखकर उसे भी इच्छा होती थी कि वो भी अपनी अच्छी अच्छी तस्वीरें डाले! अभी वह सोच ही रही थी कि टेबल पर एक खूबसूरत सा गिफ्ट पैक

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उम्मीद

संध्या अपने पति मुकेश से बोली आज मुम्बई से मेरी एक फ़ेसबुक फ़्रेण्ड ज्योति आ रही है !
मुकेश थोड़ा रूखे मन से ही ठीक है लेकिन तुम उन लोगों को जानती हो ?
संध्या -अरे हाँ बाबा मैं कोई बेवक़ूफ़ थोड़े हूँ कि बिना जाने समझे किसी को भी घर में बुला लूँगी उसके पति मुंबई में आई पी एस आॅफिसर है और वे खुद भी लेक्चरर है!

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नाकामयाब

काफी देर से मोबाइल रिंग कर रहा था जल्दी से काम छोड़कर मैंने जैसे ही मोवाइल उठाया उधर से नेहा की कुछ घबराई हुई आवाज आई…. किरण तुम फ्री हो…. मेरे हाँ कहने पर कुछ देर सोंचकर कहती है क्या करें किरण देखो ना मेघा का हसबैंड आया हुआ है.. (मेघा नेहा की बहन जिसका विवाह हुए करीब छः महीने हुआ था…! ) मैं सोंच में पड़ गई कि आखिर अपने बहनोई के आने से नेहा खुश होने के बजाय परेशान क्यों है……. वो बोल रही थी कि यशस्वी.. ( मेघा का पति ) कह रहे हैं कि अपने माँ पापा को समझाकर मेघा को मायके में ही बुलवा लीजिए.. बहुत जिद्दी है मेघा.. मेरे परिवार में किसी के साथ नहीं बनता है उसका … छोटी छोटी चीजों के लिए भी सभी से झगड़ा करती रहती है.. सबसे इतना व्यवहार खराब कर ली है कि कोई उसे पानी देने वाला भी नहीं है…..

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नजरिया

शहर में पली बढ़ी दीपिका जब गाँव में दुल्हन बनकर आई थी तो बिल्कुल अलग से माहौल में ढलना उसके लिए थोड़ा कठिन तो था ही लेकिन वह सोची चलो कुछ दिनों की तो बात है जैसे अबतक स्कूल काॅलेज में मंच पर नाटक करके या फिर फैंसी ड्रेस कम्पिटीशन में जीत हासिल कर प्राइज़ जीतती आयी हूँ तो क्यों न इस ससुराल के मंच पर भी उत्कृष्ट अभिनय करके पुरस्कार हासिल कर ही लूँ इसलिए वह गाँव के रंग में अपने आपको धीरे-धीरे ढालने लगी और कब कैसे उसपर ससुराल का रंग चढ़ने लगा उसे खुद भी नहीं पता चला!

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चमत्कार

काफी दिनों से खाली पड़े फ्लैट में जब नये पड़ोसी आये तो सभी फ्लैट वासियों के साथ – साथ मुझे भी काफी खुशी और उत्सुकता हुई कि चलो हमारे एक और पड़ोसी में इजाफा हुआ ! पड़ोसी चाहे जैसा भी हो लेकिन सुख – दुख में सबसे पहले वही आता है इसलिए खुश होना स्वाभाविक भी था!

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