नजरिया

शहर में पली बढ़ी दीपिका जब गाँव में दुल्हन बनकर आई थी तो बिल्कुल अलग से माहौल में ढलना उसके लिए थोड़ा कठिन तो था ही लेकिन वह सोची चलो कुछ दिनों की तो बात है जैसे अबतक स्कूल काॅलेज में मंच पर नाटक करके या फिर फैंसी ड्रेस कम्पिटीशन में जीत हासिल कर प्राइज़ जीतती आयी हूँ तो क्यों न इस ससुराल के मंच पर भी उत्कृष्ट अभिनय करके पुरस्कार हासिल कर ही लूँ इसलिए वह गाँव के रंग में अपने आपको धीरे-धीरे ढालने लगी और कब कैसे उसपर ससुराल का रंग चढ़ने लगा उसे खुद भी नहीं पता चला!

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चमत्कार

काफी दिनों से खाली पड़े फ्लैट में जब नये पड़ोसी आये तो सभी फ्लैट वासियों के साथ – साथ मुझे भी काफी खुशी और उत्सुकता हुई कि चलो हमारे एक और पड़ोसी में इजाफा हुआ ! पड़ोसी चाहे जैसा भी हो लेकिन सुख – दुख में सबसे पहले वही आता है इसलिए खुश होना स्वाभाविक भी था!

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बड़की बहिन

आज मुनिया कुछ ज्यादा ही खुश लग रही थी, उसके तो पैर ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे! बर्तन माजते हुए वह गुनगुना रही थी जो काफी कर्णप्रिय थे ! उसके चेहरे पर खुशी देखकर मुझे सुकून मिल रहा था क्योंकि बहुत दिनों के बाद तो उस बेचारी के चेहरे पर खुशी की एक झलक देखने को मिली थी!

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निरुत्तर

जैसे ही गाँव से चाचा का निमंत्रण कार्ड आया मैं तो उछल पड़ी…. मन ही मन स्वप्न बूनने लगी कि चलो अब मैं उन सभी गांव की पुरानी सहेलियों से मिलूंगी जिनके साथ बचपन में गुड़िया गुड्डे, कित – कित, गोटी तथा लुकाछिपी आदि खेला करती थी! मन ही मन सोच रही थी मैं कि कितने बदल गए होंगे सब लोग! शादी के बाद कहां जा पाती थी मैं गांव में ! पापा शहर में रहते थे ! जाने का मन तो बहुत होता था लेकिन दो चार दिन के लिए ही जाना हो पाता था उसमें ही मायके और ससुराल मैनेज करना पड़ता था! किसी – किसी तरह से सहेलियों से मिल पाती थी..!

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इज्जत

व्हाटस्ऐप पर नीलम का मैरिज कार्ड मैसेज पर स्नेहा और अंकित का नाम देखकर तो कुछ पल के लिए विश्वास ही नहीं हो रहा था “लग रहा था कि कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही हूँ न? खुशी तो वैसे भी बहुत हो रही थी लेकिन और भी अधिक इसलिए कि मेरा समझाना सार्थक हो गया ! फिर मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते हुए याद करने लगी….

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यकीन

अभी मीना को दुनिया छोड़े कुछ दो ही महीने हुए होंगे कि उसके पति महेश जी का अपने बेटे के रिंग सेरेमनी में शामिल होने के लिए हमें निमंत्रण आया! जिस समारोह का मुझे बेसब्री से इंतजार था पर उस दिन मेरा मन बहुत खिन्न सा हो गया था तथा मन ही मन में महेश जी के प्रति कुछ नाराजगी भी हुई थी मुझे ! मैं सोचने लगी थी कि वही महेश हैं न जो अपनी माँ के मृत्यु के छः महीने बाद भी घर में होली का त्योहार नहीं मनाने दिये! घर के बच्चों ने भी तब चाहकर भी होली नहीं खेली थी और ना ही नये वस्त्र पहने थे ! याद आने लगा कि जब होली के दिन किसी ने सिर्फ टीका लगाना चाहा था तो ऐसे दूर हट गये थे जैसे कि किसी ने उन्हें बिजली की करेंट लगा दी हो, पर मीना के दुनिया से जाने के दो महीने बाद ही यह आयोजन…….. मन तो हो रहा था कि उन्हें खूब जली कटी सुनाऊँ पर…! जाना तो था ही आखिर मीना मेरी पक्की सहेली जो थी .. इसके अलावा महेश जी और मीना ने जो मेरे लिए किया उसे कैसे कभी भूल सकती थी कि जब मेरी ओपेन हार्ट सर्जरी दिल्ली में हुई थी तब ये लोग ही उस घड़ी में हर समय हमारे साथ खड़े रहे!

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प्रेम और इज्जत

अपने अतीत और वर्तमान के मध्य उलझ कर अजीब सी स्थिति हो गई थी दिव्या की! खोलना चाहती थी वह अतीत की चाबियों से भविष्य का ताला! लड़ना चाहती थी वह प्रेम के पक्ष में खड़े होकर वह समाज और परिवार से यहाँ तक कि अपने पति से भी जिसके द्वारा पहनाये गये मंगलसूत्र को गले में पहनकर हर मंगल तथा अमंगल कार्य में अब तक मूक बन साथ देती आई है ! जो दिव्या अपने प्रेम को चुपचाप संस्कारों की बलि चढ़ते हुए उफ तक नहीं की थी पता नहीं कहाँ से उसके अंदर इतनी शक्ति आ गयी थी दिव्या में !

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