गृह लक्ष्मी हूँ

गृह लक्ष्मी हूँ
गृह स्वामिनी हूँ
साम्राज्ञी हूँ और
अपने सुखी संसार में
खुश भी हूँ
फिर भी
असंतुष्ट हूँ स्वयं से

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स्त्री विमर्श

विषय है स्त्री विमर्श
ढूढ रही हूँ शब्द इमानदारी से
कि लिखूं स्त्रियों की असहनीय पीड़ा
दमन , कुण्ठा
कि जी भर कोसूं पुरुषों को
कि जिन पुरूषों को जानती हूँ उन्हें ही
कुछ कहूँ भला बुरा
पर

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जाने से पहले

जाना तो
है ही
कभी न कभी
हमें भी
किसी दिन
इसलिये तो
जी चाहता है
कुछ कह लें कुछ सुन लें
जाने से पहले

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पानी की तरह होती हैं स्त्रियाँ

पानी की तरह होती हैं स्त्रियाँ
समझा होगा पूर्वजों ने
कि जिस बर्तन में डालो
वैसा ही आकार ले ले लेंगी
तभी तो

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सम्पूर्ण पुरुष

जिसमें दुनिया की
सारी खूबसूरती समाहित हैं
जो एक ऐसा दर्पण है
जिसमें देखते हुए
मुझे अपने
खूबसूरत होने का
दंभ हो जाता है
वह हैं तूम्हारी
आँखें

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प्रिय तुम मेरे घर आना

स्वप्न जो रह गये अधूरे
कर देना वो सारे पूरे
प्रीत की रीत निभाना
प्रिय तुम मेरे घर आना

गिनूंगी जब मैं अन्तिम घड़ियाँ
तोड़ सभी रीति की कड़ियाँ
अपना हाथ बढ़ाना
प्रिय तुम मेरे घर आना

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नभ भी घुट घुट जी रहा है

बात मन की क्यों बताऊँ
पीर अपनी क्यों जताऊँ
अश्रु अपना पी रहा है
नभ भी घुट – घुट जी रहा है

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