एक चिट्ठी भाई के नाम


जैसे ही नैहर की
चौकठ पर
मैंने रखा पांव
सज – धजकर खड़ी थी भौजाई
लेकर हांथो में सजी
थाल

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आसमान चाहिए

मैं समझती हूँ
तुम्हारे भावनाओं को
तब से
जब से तुमने पूर्ण विश्वास के साथ
मुझे सौप दिये थे
अपना घर ,परिवार
और मैं

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चूड़ियाँ

कितनी मधुर होती हैं
चूड़ियों की खनकार
जिनके मधुर संगीत
मंत्रमुग्ध कर देती हैं
साजन को
खींच लेती हैं उनके
मन की डोर

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ओल्ड फैशन

स्वछंदता ले रही थी
लज्जा का
साक्षत्कार
सिमटी, सकुचाई सी लज्जा
नयन झुकाये
धीरे से अपने दोनो हाथ जोड़कर बोली
नमस्ते

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गृह लक्ष्मी हूँ

गृह लक्ष्मी हूँ
गृह स्वामिनी हूँ
साम्राज्ञी हूँ और
अपने सुखी संसार में
खुश भी हूँ
फिर भी
असंतुष्ट हूँ स्वयं से

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स्त्री विमर्श

विषय है स्त्री विमर्श
ढूढ रही हूँ शब्द इमानदारी से
कि लिखूं स्त्रियों की असहनीय पीड़ा
दमन , कुण्ठा
कि जी भर कोसूं पुरुषों को
कि जिन पुरूषों को जानती हूँ उन्हें ही
कुछ कहूँ भला बुरा
पर

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