मित्रता

ये अम्बर भी न
सूर्य देव की तपिश के सहारे
बार-बार धरती मैया की
अग्नि परीक्षा लेता है
बार-बार धरती मैया
परीक्षा देने को हो जाती है
विवश
या शायद
सहर्ष

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चूड़ियाँ

कितनी मधुर होती हैं
इनकी की खनकार
जिनके मधुर संगीत
मंत्रमुग्ध कर
खींच लेती हैं अपनी ओर
सजना के
मन की डोर

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शाश्वत प्रेम

सुनो कृष्ण
यूँ तो मैं तुममें हूँ
और तुम मुझमें
बिल्कुल सागर और तरंगों की तरह
या फिर
तुम बंशी और मैं तुम्हारे बंशी के स्वर की तरह
शब्द अर्थ की तरह
आदि से अनंत तक का नाता है
मेरा और तुम्हारा

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मन

क्यों बेचैन मन
क्या चाहिए उसे
शायद शिकायत है
उसे
स्वयं से ही
इसी लिए असंतुष्ट
भटकता रहता है
इत उत
लक्ष्य विहीन
मन

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स्त्रिलिंग – पुलिंग

कविता स्त्रीलिंग
और प्रेम पुलिंग
होती है भावाभिव्यक्ति
बनती है प्रेम कविता
सुन्दर

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