एकौ साधे सब सधै, सब साधे सब खोय

मानव मन बड़ा चंचल होता है। एक पाया नहीं कि दूसरे को पाने की इच्छा जागृत हो जाती है। इसलिये उसे साधित करना बहुत कठिन कार्य है।

बात कुछ चौबीस – पच्चीस वर्ष पूर्व की है। तब मुझे किसी कार्यक्रम के लिए सितार पर पाँच राग अच्छी तरह से तैयार करना था। मेरे गुरु जी हफ्ते भर से एक ही राग ( बहार ) का कभी रजाखानी गत तो कभी मसीतखानी गत के स्थाई, अन्तरा, आरोह, अवरोह, पकड़ पर बार – बार तबले के संगत के साथ अभ्यास करवाये जा रहे थे जब कि राग अच्छी तरह से तैयार हो गया था।

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