पुस्त_समीक्षा-वैविध्य

जीवन सफर में बहुत से उतार – चढ़ाव आते हैं जिन्हें तय करते समय हमारे मन वाटिका में तरह-तरह के भावनाओं के कुसुम पल्लवित और पुष्पित होते रहते हैं जिन्हें चुन – चुन कर लेखक – लेखिकाओं तथा कवि एवम् कवयित्रियों की मालिन लेखनी पिरोकर वर्ण माला का आकार देती है। कुछ यूँ ही कवयित्री रश्मि सिंह जी की लेखनी ने बहुत ही खूबसूरती से विविध प्रकार के शब्द सुमनो को चुन – चुन कर काव्य माला तैयार किया है जिसका नाम है वैविध्य। रश्मि सिंह जी द्वारा रचित प्रथम काव्य संग्रह संग्रह का वैविध्य नाम वास्तव में उनकी रचनाओं के हिसाब से बहुत ही सटीक है

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जनता दरबार

हमारे आसपास के वातावरण में कई तरह की घटनाएँ घटित होती रहतीं हैं जिसे देखकर या सुनकर हमारा संवेदनशील मन कभी हर्षित होता है तो कभी व्यथित और फिर कभी अचंभित भी। और फिर हम मानव के स्वभावानुरूप अपने अपनो, इष्ट मित्रों, पड़ोसियों आदि से उस घटना की परिचर्चा करके अपनी मचलती हुई संवेदनाओं को शांत करने का प्रयास करते हैं। किन्तु एक लेखक का मन सिर्फ परिचर्चा करने मात्र से शान्त नहीं होता बल्कि उसकी तो नींद चैन सब छिन जाती हैं। घटनाएँ सोते – जागते मस्तिष्क पटल पर मंडराने लगतीं हैं, लेखनी मचलने लगती है, शब्द चहकने लगते हैं और फिर लिखी जाती हैं कहानियाँ। शायद ऐसा ही कुछ घटित हुआ होगा वरिष्ठ कथाकार शम्भू पी सिंह जी के इर्द – गिर्द और उनकी लेखनी चल पड़ी होगी। वैसे उन्होंने अपने उत्तर कथन में इस बात को स्वयं स्वीकारा भी है कि देखी सुनी घटनाओं ने शब्द दिये और कथा का प्रवाह बना रहे इसलिए कल्पना का भी सहारा लिया।

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प्रार्थना

श्रद्धा का सितारा टांककर चुनरी बनाई हूँ |
सुमन ले भावनाओं का मैं पूजा थाल सजाई हूँ |
पखारे पाँव मेरे अश्रु माँ मैं क्या करूँ अर्पण ,
दयामयि माँ तुम्हारे दर मैं खाली हाथ आई हूँ |

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रोशनी के दीप

जब – जब मन अन्तर्द्वन्द्ध के गहन तिमिर में घिर जाता है तब-तब भावनाओं और संवेदनाओं की तिल्लियाँ स्वतः ही हृदय से टकराकर प्रस्फुटित करतीं हैं चेतना चिनगी , तभी झिलमिलाने लगते हैं सृजन के दीप , रौशन हो जाता है अन्तः जो करना चाहता है विश्व समाज को ज्योतिर्मय। बनकर रौशनी के दीप।

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भारतीय_नारी_की_दशा

यह आलेख आज से चौंतीस वर्ष पूर्व मैंने लिखी थी ।

नारी की दशा हमारे देश में आदिकाल से ही सोचनीय रही है। पुरुष ने तो हमेशा ही नारी की उपेक्षा की है।
नारी के गौरव और प्रतिष्ठा के सबसे बड़े हिमायती मनु ने यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता कहकर भी नारी को धर्म शास्त्र सुनने का अधिकार नहीं दिया। महाकवि तुलसीदास ने भी

ढोल, गँवार, शुद्र, पशु, नारी।
ये सब तारन के अधिकारी

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