भैरवी

आज यूँ ही समाचार पत्र पर साहित्य पेज को पलटा तो एक जानी पहचानी सी खूबसूरत तस्वीर पर मेरी नज़रें ठहर गईं ! फिर नाम मैंने नाम देखा तो भैरवी ! बला की खूबसूरत तो थी ही अब तो भैरवी और भी खूबसूरत लग रही थी इस तस्वीर में ! देखकर तो ऐसा लग रहा था कि यदि सौन्दर्य की प्रतियोगिता रखी जाय और उसकी प्रतिद्वंद्वी मेनका भी हो तो भी प्रथम स्थान भैरवी को ही मिलना तय होता ! मैंने उसकी लिखी गज़ल को कई बार पढ़ा और अपने हृदय में उठे प्रश्नों का उत्तर ढूंढते – ढूंढते स्मृतियों में विचरण करने लगा!

उसका खत मेरे हाथों में था जिसके एक – एक शब्द आज भी मुझे याद हैं! खत भैरवी ने मुझे स्वयं ही दिया था जब मैंने उससे आखरी बार मिला था! खत देते समय उसके हाथ काप रहे थे आँखों से अश्रुधार बह रही थी लेकिन उसके अधर मुस्कुराने का प्रयास कर रहे थे और मैं उसके अश्रु तक पोछने में स्वयं को अक्षम पा रहा था! सच में मैंने स्वयं को इतना विवश कभी नहीं पाया!
लाल बनारसी साड़ी में लिपटी भैरवी उस पर से जड़ाऊ जेवर से सजी , माँग में लाल सिंदूर, माथे पर लाल बिंदी अहा उसका रूप लावण्य तो देखते ही बन रहा था! एक पल के लिए तो मन में विचार आया कि काश भैरवी के माँग का सिंदूर मेरे नाम का होता लेकिन मैं अपने आप को ही समझाते हुए भैरवी के कमरे से बाहर चला आया क्यों कि भैरवी के दमकते हुए रूप को देख मेरी नज़रें चकाचौंध हो रहीं थीं इसलिए अब और देर तक मैं नहीं देख सकता था साथ ही शादी का घर था कब कौन पहुँच जाये कमरे में! वो तो भैरवी की सहेली की मेहरबानी थी कि इतनी भीड़ भाड़ में भी मुझे उससे मिला दिया!

भैरवी का विवाह सम्पन्न हो गया और हम वापस लौट आये ! भैरवी के विवाह के एक महीने बाद ही मेरे पिता का ट्रांसफर उस शहर से दूसरे शहर में हो गया था! उसके बाद न तो उसने मेरी खबर ली और न ही मैंने लेकिन उसकी स्मृतियों को मैं अपने हृदय पटल पर अब तक संजोये हुए रखा हूँ! हाँ कभी-कभी सपने में वह जरूर मिलने आ जाया करती है लेकिन जैसे ही स्वप्न टूटता है मैं बहुत देर तक उसी के बारे में सोचता रहता हूँ – कैसी होगी, कहाँ होगी, खुश भी है या नहीं, मुझे वो भी याद करती है या नहीं…

कितना भी कोशिश कर लूँ लेकिन अपने पहले प्यार को मैं अपनी चेतना से नहीं निकाल पाया!
जब मेरे दरवाजे की घंटी बजी थी और मैंने दरवाजा खोला तो मेरे सामने एक खूबसूरत किशोरी खड़ी थी उसे देखकर तो लगा कि यही वह लड़की है जिसे ईश्वर ने मेरे लिए बनाया है! हरे सलवार कुर्ते में उस पर लाल दुपट्टा ओढ़ कर उस रूपमती को मैं मन्त्रमुग्ध हो एक टक देखते रह गया था लग तो ऐसा रहा था कि जैसे मेरे जीवन में सावन आ गया हो हाँ मुझे यूँ देखते देखकर वह अवश्य ही झेप गई थी! फिर मैंने उससे पूछा क्या नाम है आपका….. भैरवी तपाक से बोली वह मैं सुरभि की सहेली हूँ!
अच्छा – अच्छा आइये मैं पहली बार आपको देखा न इसीलिये…. मैनें सुरभि से अपनी सफाई देना चाहा!
कोई बात नहीं अभी एक महीने पहले ही इस शहर में मेरे पापा का ट्रांसफर हुआ है तो….
अच्छा तभी तो….
मैं भैरवी को ड्राइंग रूम में ले गया और सुरभि को आवाज़ लगाई देखो कौन आया है! सुरभि के आते ही मैं अपने रूम में चला गया लेकिन मेरा मन तो हो रहा था कि सुरभि से और भी बात करूँ तभी कुछ देर बाद सुरभि की आवाज़ आई भैया चाय पीनी है तो आ जाइये यहाँ मुझे तो लगा ईश्वर ने मेरे मन की सुन ली!
जब सुरभि केतली से तीसरा कप भरने लगी तो भैरवी ने सुरभि को रोकते हुए कहा मैं चाय नहीं पीती!
सुरभि ने कहा क्यों?
भेरवी – मम्मी बोलती है इस उम्र में चाय पीने से होठ काले हो जाते हैं!
उसकी इस बात पर तो हम दोनों भाई बहन हँस पड़े थे हमारा हँसना शायद उसे बुरा लगा था इसीलिये चाय लेकर गटागट पी गई थी ऐसे में उसके होठ तो जरूर जले होंगे यह सोचकर मुझे अपने व्यवहार पर गुस्सा भी आया था इसलिये मैंने उससे माफी भी माँग ली थी और उसने मुस्कुरा दिया था जिसे मैंने माफी मान लिया था!
उसके बाद तो भैरवी का अक्सर मेरे घर आना होता था सच तो यह है कि सुरभि से ज्यादा मैं भैरवी की प्रतीक्षा किया करता था और नहीं आने पर उदास हो जाया करता था! मन तो होता था कि मैं ही उसके घर चला जाऊँ पर कैसे जाता तब लड़के और लड़कियों के मेल जोल को लोग सहज स्वीकार नहीं कर पाते थे! बार – बार जी चाह रहा था कि अपने दिल की बात खोलकर रख दूँ उसके सामने लेकिन डरता था कि कहीं उत्तर ना में न मिल जाये तो, ऐसे तो कम से कम भ्रम में ही जी रहा हूँ न मैं! वैसे उसके हाव भाव से यह तो लगता था कि वह भी मुझे पसंद करती है पर मेरे लिए सिर्फ पसंद करना ही काफी नहीं था मैं तो उससे मन ही मन प्यार कर बैठा था और उससे भी यही अपेक्षा कर रहा था!
एक दिन हिम्मत जुटाकर मैंने भैरवी को पत्र लिख ही दिया..

प्रिय भैरवी

प्रथम दृष्टया ही न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा कि मैं तुम्हें जन्मों से जानता हूँ ! तुम्हारा सानिध्य मुझे अच्छा लगता है और दूरी विचलित कर देती है! तुम मुझे इस दुनिया की क्या पूरे ब्रम्हांड की सबसे खूबसूरत लड़की लगती हो! अगर इसी को प्यार कहते हैं तो सच में मुझे तुमसे प्यार हो गया है किन्तु मुझे यह पता नहीं कि तुम्हे मुझसे प्यार हुआ है या नहीं! अगर तुम भी मेरे लिये कुछ ऐसा ही महसूस करती हो तो उत्तर जरूर देना मैं प्रतीक्षा करूँगा!

अम्बर

उस दिन जब भैरवी अपने घर वापस जाने लगी थी तो मैंने धीरे से उसे यह खत पकड़ा दिया था खत लेते समय भैरवी के हाथ अवश्य कांपे थे उसके क्या हाथ तो मेरे भी काप रहे थे! भैरवी तो चली गई पर मैं उसके खत की प्रतीक्षा प्रतिदिन करने लगा पर उस दिन के बाद न तो भैरवी आई और न ही उसका खत! मैं अपनेआप पर बहुत नाराज हुआ कि आखिर मैंने खत दिया क्यों कम से कम इससे पहले उसे देख तो लिया करता था! कई बार मन में आया कि अपनी बहन सुरभि से ही भैरवी के बारे में पूछूँ किन्तु पूछ न सका!
एकदिन अचानक टेबल पर दो कार्ड पड़ा हुआ था जिसपर मेरा और सुरभि का नाम लिखा हुआ था! मैंने कार्ड खोलकर देखा तो किं कर्तव्य विमुढ़ हो गया, सर चकराने लगा था अक्षर धुंधले दिखाई दे रहे थे अब मुझे भैरवी का उत्तर मिल गया था क्योंकि निमन्त्र कार्ड भैरवी के ही विवाह का था !
विवाह में जाने की मेरी इच्छा तो बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन सुरभि के साथ जाना ही पड़ा ! दरवाजे बारात लग रही थी, दूल्हा घोड़े पर सवार था, बैंड बाजा के एक – एक बीट मेरे सपनों पर प्रहार कर तोड़ रहे थे और मैं स्वयं को सम्हालने का प्रयास कर रहा था!
मुझे तो अब और ठहरने का मन नहीं था लेकिन बहन को अकेले छोड़कर घर लौटता तो मम्मी – पापा मुझे परेशान कर देते इसीलिये जयमाला से लेकर सिंदूर दान तक का रस्म खत्म होने तक रुका रहा ! अचानक मैं अपने नाम पुकारे जाने पर पीछे मुड़ा तो एक लड़की शायद भैरवी की कोई सहेली होगी मुझसे बोली भैरवी आपसे मिलना चाहती है! मैं उसके पीछे – पीछे हो लिया तो एक कमरे में गया जिसमें भैरवी थी! कमरे में वो लड़की मुझे छोड़कर चली गई! मैं और भैरवी एकदूसरे को एकटक देख रहे थे! हम दोनों के आँखो से अश्रुधार बह रहे थे, न तो मैं ही उससे कुछ कह सका और न ही वही मुझसे कुछ कह सकी हाँ एक खत मुझे जरूर थमा दिया था जिसे लेकर मैं एकांत ढूढने का प्रयास करने लगा था जो मुझे अपने कमरे में ही आकर मिल सका था जिसमें लिखा था..

प्रिय अम्बर
सदैव प्रसन्न रहो
जीवन एक बहती धारा है कहाँ इसका किनारा है किसी को पता नहीं! नीयति का चक्र चलता रहता है जिसे चलाने वाला कोई और ही होता है हम तो सिर्फ उसके हिसाब से चलते रहते हैं हमारी मर्जी चलती ही कहाँ है बस अपनी विवशता पर हम सिर्फ आँसू बहा सकते हैं! लेकिन ये आँसू व्यर्थ नहीं जायेगा निश्चित ही ये अश्रु हृदय धरा को सींचने का काम करेंगे जिसमें भावनाओं के फूल खिलेंगे, सारा चमन महक उठेगा!
तुमने मुझसे उत्तर माँगा था न क्या उत्तर दूँ मैं! कभी तुम अपने हृदय पर हाथ रखकर देखना मेरी धड़कने अवश्य ही तुम्हारे हृदय तक अपने जज्बातों को पहुँचाती होंगी क्योंकि उनके तार तो प्रथम दृष्टया ही आपस में जुड़ गये थे लेकिन………..
बस तुम मेरी विवशता को समझकर मुझे क्षमा कर देना और मुझसे भी अच्छी लड़की से शादी कर लेना.! तुम तो इतने हैंडसम हो कि कौन लड़की तुमसे शादी नहीं करना चाहेगी……

भैरवी

2 विचार “भैरवी&rdquo पर;

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