सखि सावन बड़ा सताए रे

सखि सावन बड़ा सताए रे

जबसे उनसे लागि लगन
तन मन में मेरे जागि अगन
नयन करे दिन रैन प्रतीक्षा
अब दूरी सहा नहीं जाए रे
सखि सावन………………..

बगियन में झूला डारी के
सखि संग झूलें कजरी गाई के
बरस गयो रिमझिम बरखा ज्यों
नयनन कजरा बही बही जाए रे
सखि सावन बड़ा……………….

भीग गयो तन भी मन भी
हिय की तपन रह गई अभी भी
बहे पुरवाई लिए अंगड़ाई
अचरा उड़ी उड़ी जाए रे
सखि सावन…………………..

कासे कहूँ मैं मन की बतिया
जाग जाग कटे दिन रतिया
कभी भी पलकें झपक गई तो
सजना सपने में आई जगाए रे
सखि सावन बड़ा………………..

लिखने बैठी गीत सावन की
सुनी आहट सजन आवन की
छोड़ कलम मैं द्वार आ गई
पर सजना मेरे नहीं आए रे
सखि सावन……………………….

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