बड़ी बहु

वैसे तो हम शहर में रहते थे लेकिन हमारी गर्मी की छुट्टियाँ हमेशा ही नानी या दादी के घर यानि गाँवों में बीतती थीं । मैं जब भी गाँव जाती तो वहाँ के सभी छोटे – बड़े ममेरे – चचेरे भाई – बहन मुझे घेर लेते और मैं उस छोटी सी सेना की सेनापति बनकर कभी कभी कित – कित तो कभी अन्त्यक्षरी या या फिर आइस – पाइस खेलती। गाँव के सभी भाई बहन बहुत मुझे प्यार करते थे इसलिए जब मैं वापस आने लगती थी तो सभी बहुत रोते थे।

वैसे तो मुझे गाँवों में छुट्टियों में जाना अच्छा लगता था लेकिन वहाँ का सोच – विचार, रहन – शहन, तौर तरीका मुझे अच्छे नहीं लगते थे। मन के कोने में कहीं न कहीं खुद को औरों से उँचा समझने की भावना व्याप्त थी इसीलिए जब मेरी शादी की बात किसी गाँव के निवासी के बेटे से चलने लगी तो मैंने साफ मना कर दिया । वैसे भी मेरा अभी शादी करने का मन नहीं था क्योंकि मुझे पढ़ाई करनी थी और गाँव में ससुराल होने की बात भी खटक रही थी। इस बात से मैं बहुत परेशान रहने लगी। तभी मेरी मौसी कुछ दिनों के लिए मेरे घर आईं । मम्मी ने मौसी से उस रिश्ते के बारे में बताया। हालांकि मैं इस रिश्ते को लेकर खुश नहीं थी तो मौसी ने मेरी भावनाओं को भांप लिया और बाद में मुझसे अकेले में पूछा कि तुम इस रिश्ते से खुश नहीं हो..? तो मैंने मौसी से साफ – साफ कर दिया की मुझे गाँव के लोगों के दकियानूसी विचार पसंद नहीं हैं। ऐसे में मैं उन लोगों के साथ ताउम्र कैसे निभा पाऊँगी । मेरी बात सुनकर मौसी ने मुझसे बड़े प्यार से समझाते हुए कहा कि देखो बेटा तुम शहर में रहती आई हो तो तुम्हारी असहजता जायज है लेकिन यह सोचो कि तुम वहाँ जाकर उन लोगों के ऐसे विचारों को बदल भी तो सकती हो । गाँव के लोग बहुत ही सरल और सीधेसादे होते हैं। तुम पढ़ी लिखी हो तो उन्हें अपने तर्कों से समझाना। यह तो तुम्हारे लिए और भी अच्छा ही होगा कि वहाँ के लोग तुम्हें पढ़ा – लिखा समझकर और भी इज्जत देंगे । देखती नहीं हो गाँव में तुम्हारे भाई – बहन सब तुम्हें कितना प्यार व सम्मान देते हैं और तुम्हारी बात मानते हैं । मुझे विश्वास है कि वहाँ पर भी तुम्हारी बातों को अवश्य तरजीह दी जायेगी । पता नहीं क्यों मुझे उस दिन मौसी की बातें तर्कसंगत लगीं और काफी सोचने विचारने के बाद मैं शादी के लिए राजी हो गई ।

ससुराल पहुंच कर मुझे घबराहट तो हो रही थी लेकिन मौसी की बातें मुझे याद थीं। इसलिए मैं सबके साथ प्रेम से रहने लगी। वहाँ पहुँच कर मैंने उन लोगों के असहज तौर तरीकों पर अपना मत तो रखा ही साथ ही अपनी ननदों को सिलाई – कढ़ाई, बुनाई, रसोई जैसे गुण भी सिखाया। जल्द ही मेरे ससुराल के परिजन मुझे बहुत स्नेह और सम्मान देने लगे। मैं भी वहाँ के तौर तरीकों, सोच विचारों को बदलने और खुद भी उनके अनुरूप ढलने की कोशिश करने लगी।
आज की ऐसी बातें हैं जिनको मैंने अपने सही दृष्टिकोण से बदल दिया है।
अपनी इस कहानी के माध्यम से मैं यही कहना चाहती हूँ कि आज मौसी की सीख की बदौलत मैं बड़ी बहु की जिम्मेदारी निभाते हुए कोशिश कर हर उस गलत सोच को बदला जो हमारे समाज को पिछड़ा बनाने की वजह थी।
मेरा यही मानना है कि हमें अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभाना चाहिए।

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