बागवान

#बागवान नाम सुनते ही हमारे आँखों के सामने हेमामालिनी और अमिताभ बच्चन की फिल्म आँखों के सामने घूमने लगती है। वाकई इस फिल्म की पटकथा बहुत ही हृदय स्पर्शी और मार्मिक है जिसको बहुत ही खूबसूरती से फिल्माया गया है।
प्रायः फिल्मों और कहानियों में किसी एक पक्ष को नायक तथा दूसरे पक्ष को खलनायक दिखा दिया जाता है जो कि पूर्ण सत्य नहीं होता है। और जहाँ सवाल बुजुर्गों का आता है तब तो समूचे युवा पीढ़ी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है चाहे वह कितनी ही समस्याओं से जूझ क्यों न रहीं हों।

किसी को यह ध्यान नहीं जाता है कि बेटा वर्षों से नई कमीज नहीं ली। बहू अपने तथा अपने बच्चों मे से कटौती कर बड़े बुजुर्गों की जरूरतों को प्रार्थमिकता देती है।
कहने को तो बहुत कुछ है फिलहाल
उदाहरण के तौर पर मैं बागवान फिल्म के ही एक दृश्य को लेना चाहती हूँ जब अमिताभ बच्चन पेपर पढ़ रहे होते हैं और उनकी बहू कहती हैं कि आपके बेटे को आॅफिस जाना है आप तो बाद में भी पढ़ सकते हैं। मुझे इस बात में कोई बुराई नहीं दिखी क्योंकि आजकल प्राइवेट कम्पनियों में कार्यरत युवा पीढ़ी की दिनचर्या ही ऐसी मशीनी हो गई है कि उनके साथ सामन्जस्य बिठाना ही होगा वर्ना वह नौकरी नहीं कर पायेंगे।
खैर इस विषय में बात करने पर पोस्ट बहुत लम्बा हो जायेगा अतः मैं मुख्य विषय पर आती हूँ, और वह मुख्य विषय है पत्रिका बागवान, वर्ष – 1, अंक 4 ( अप्रैल, मई, जून) । जिसे सम्पादित किया है माननीय Shyamji Sahayजी सहाय जी ने।
श्याम जी सहाय जी ने अपनी सम्पादकीय पाती में ही बड़े ही खूबसूरती से बुजुर्गों और युवाओं के मध्य सामन्जस्य बिठाते हुए लिखी है…..
परिवर्तन निरन्तर होता रहता है। जो इसे स्वीकार कर लेते हैं उनका जीवन सुखमय हो जाता है। जो इसके विपरीत चलेंगे या परिवर्तन के साथ स्वयं को नहीं जोड़ेंगे वे शायद दुखी ही रहेंगे और उनका जीवन अपने जमाने को याद करके रोते ही बीत जायेगा। ऐसे लोग पीढ़ीगत टकराव का सामना करेंगे। पीढ़ीयों का अन्तर भी तो परिवर्तनों, बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाने का ही नतीजा है………….

इसी प्रकार आगे कुमार अनुपम जी अपने लेख में लिखते हैं कि वृद्धावस्था अभिशाप नहीं है।
एक तरफ नेता गण वृद्धावस्था में देश चला रहे हैं तो दूसरी तरफ वृद्धावस्था को एक चिन्ताजनक समस्या मान कर वृद्ध समाज चिंतित है……….

तो फिर कहीं रामायण प्रसाद जी सुझाव देते हुए कहते हैं –
बचपन, जवानी और बुढ़ापा मानव जीवन के विविध आयाम हैं। परिवर्तन शील समाज में मनुष्य को इन तीनो आयाम के फलाफल को भोगना पड़ता है। बुढ़ापा तो एक दिन आयेगा ही। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसको एक अभिशाप न मानकर इसे अनुपम आनन्द का श्रोत बना लें………..

प्रोफेसर डाॅक्टर सुधा सिन्हा ने बुजुर्गों के दर्द को उकेरते हुए अपनी कविता के माध्यम से कहा है-
कभी तो मैं भी सभी का
बोझ ढोता रहता था
कंधे पर उन सबको
बिठाकर घूमता था।……..

तो फिर रविशंकर सिंह जी की भी अत्यंत मार्मिक पंक्तियाँ हृदय को हिला कर रख देती हैं –

एक जोड़ी बूढ़ी आँखें
टिकी हैं पकते भात पर
नज़रें हटती नहीं चूल्हे पे चढ़ी तसली से
वे जानती हैं कि
हमारे लिये
कोई नहीं जलायेगा चूल्हा

दिवाकर पांडेय जी लिखते हैं –

कूकती थी कोयल कभी
जीवन वसंत में।
चलता था जीवन रथ
मगन दिगन्त में
गाकर दिशाएँ मीत
करती अभिनन्दन थीं।
शीतल हवाएँ सारी
करती पग वंदन थीं।…

इस प्रकार अनेक विद्वान तथा विदूषियों के सुन्दर एवं सार्थक अनुभवों, लेखों, कविताओं तथा लघुकथाओं से सुसज्जित है यह पत्रिका जिसमें अंत में पुनः माननीय श्याम सहाय जी ने चलते – चलते में एक सुनी सुनाई घटना का वर्णन करते हुए बहुत ही सुन्दर और सार्थक संदेश देते हैं
यूनान के एक मसहूर दार्शनिक सुकरात का एक बुजुर्ग सज्जन से मुलाकात होता है। सुकरात ने बुजुर्ग की खुशियों और सुख समृद्धि का राज जानना चाहा तो बुजुर्ग ने कहा –
मैं और मेरी पत्नी अपना पारिवारिक उत्तरदायित्व बेटे बहुओं को सौंपकर निश्चिंत हैं। अब वे जो कहते हैं हम वही कर देते हैं। जो खिलाते हैं खा लेते हैं। अपने पौत्र पौत्रियों के साथ हँसते खेलते हैं। उनके किसी कार्य में हम बाधक नहीं बनते हैं । पर जब वह किसी मशविरा के लिए मेरे पास आते हैं तो हम अपने जीवन के सारे अनुभवों को उनके सामने रखते हुए उनके द्वारा किये गये भूल से उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों से सचेत कर देते हैं। अब वे मेरी राय माने या न माने यह उन पर निर्भर करता है। इसके लिए मैं तनावग्रस्त नहीं होता।

पत्रिका पढ़ने के पश्चात हम यह कह सकते हैं कि यह पत्रिका अपने उद्देश्य में पूरी तरह से सफल हुई है जिसकी सफलता के लिए मैं दैनिक जागरण बागवान परिवार को हार्दिक बधाई और अनंत शुभकामनाएँ देती हूँ और विशेष रूप से सम्पादक महोदय श्याम जी सहाय जी, बांकेबिहारी साव जी तथा सुनील कुमार सिन्हा जी की सराहना करते हुए बधाई और शुभकामना देती हूँ।

पत्रिका मुफ़्त वितरण के लिए है
प्रकाशक एवं मुद्रक दैनिक जागरण पटना है
आप भी बुजुर्गों पर केन्द्रित लघुकथा, संस्मरण, आलेख, कविताएँ, यात्रा वृतांत, शिकायत आदि. (गद्य की शब्द सीमा पाँच सौ एवम् पद्य की शब्द सीमा दो सौ होनी चाहिए साथ ऊरचनाएँ पूरी तरह से मौलिक होनी चाहिए) इस पते पर भेज सकते हैं –
जागरण बागवान क्लब, द्वारा ब्रांड डिपार्टमेंट दैनिक जागरण कार्यालय
C-5,C-6 एवम् C-15 इंडस्ट्रियल एरिया
पाटलिपुत्र पटना – 13
फोन नम्बर – 06123918900
ईमेल-brand@pat.jagran.com

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