रोशनी के दीप

जब – जब मन अन्तर्द्वन्द्ध के गहन तिमिर में घिर जाता है तब-तब भावनाओं और संवेदनाओं की तिल्लियाँ स्वतः ही हृदय से टकराकर प्रस्फुटित करतीं हैं चेतना चिनगी , तभी झिलमिलाने लगते हैं सृजन के दीप , रौशन हो जाता है अन्तः जो करना चाहता है विश्व समाज को ज्योतिर्मय। बनकर रौशनी के दीप।

कुछ ऐसा ही भाव उत्पन्न हो उठा कवयित्री प्रीति शर्मा के काव्य संग्रह रोशनी के दीप को पढ़ने के उपरांत।
खूबसूरत 69 काव्य कुसुमों से सुसज्जित संकलन का आवरण भी शीर्षक के अनुरूप ही झिलमिलाते दीपों से सुसज्जित हैं जो पाठकों को अपनी तरफ सहज ही आकृष्ट करने में निश्चित ही सफल होंगे।
कवयित्री ने अपनी बात में ही इस बात को स्वीकारा है कि स्त्री मन अत्यंत कोमल होता है। जहाँ अपनों का दुख उसे गहरी पीड़ा से निमग्न कर देता है वहीं थोड़ी सी खुशी उसे अपार प्रसन्नता से भर देती है इस बात से स्त्रियाँ तो सहमत होंगी ही और मेरी समझ से पुरुष भी इस बात से असहमत नहीं होंगे।
इन्हीं कोमल भावनाओं को शब्दों में पिरोते हुए कवयित्री लिखतीं हैं

मैं गूँथ रही हूँ
छंदालंकारों के
बोझ से विहीन
सरल – सहज
शब्दों की एक
माला
मैं बहा रही हूँ
स्नेह सुरभि से
सिक्त एक
भाव – विह्वल
धारा………

उपर्युक्त पंक्तियों में कवयित्री ने यह स्पष्ट किया है कि उन्हें छंदों का बंधन स्वीकार नहीं। वह तो छंद मुक्त हो बहना चाहती हैं निर्झर। फिर भी कवियित्री अपनी भावनाओं की प्रबलता, कवित्व की सूझ – बूझ और सुन्दर शब्द चयन की बदौलत तुकों का मेल कराते हुए सुन्दर काव्य सृजन कर समाज को सार्थक संदेश दिया है।
यथा –
रोशनी के दीप बनकर झिलमिलाऊँ,
इस तिमिर को आज मैं जग से मिटाऊँ,

खो गये हैं रागिनी के राग जो,
उस राग को मैं नया जीवन सिखाऊँ।

संघर्षरत जीवन रहे
गर्वित सदा भारत रहे

आज तू बदलाव का एक नया आह्वान कर दे
चल निकल नये रास्तों पर कंटकों का संहार कर दे।

कहीं स्वयं को तलाश करती हुई लिखतीं हैं..

मैं आज निकली हूँ
स्वयं की तलाश में
जहाँ मैं हूँ और जहाँ होना चाहती हूँ

कहीं – कहीं रिश्तों से आहत होकर कवयित्री लिखतीं हैं..

अब रिश्ते भी माँग रहे हैं
नित नूतन परिभाषायें
अब रिश्ते भी छाँट रहे हैं
नित नूतन अभिलाषायें
प्रायः अपनी भावनाओं को शब्दों में पिरोकर पुस्तकों में सुसज्जित करते हुए सभी लेखक – लेखिकाएँ तथा कवि – कवित्रियाँ अपने मन में यह तो सोचतीं ही होंगी कि चलो मैं इस दुनिया में न भी रहूँगी तो मेरी संवेदनाएँ तो जीवित रहेंगी ही। इसी भावना को शब्दों में गूँथते हुए कवयित्री कहती हैं..

मैं ना रहूंगी, पर
पूनम का चाँद तो होगा
तारों की चूनर से सजा
नीला आसमान तो होगा

और फिर आज के साहित्य जगत या फिर राज भवन में बटते हुए अन्य हुए सम्मानों को तुच्छ साबित करते हुए असल कवि धर्म निभाते हुए कह रही हैं..

आस नहीं करते हैं हम, राज भवन के सम्मानो की ।
आज हमें कीमत दे दो, भारत माँ के अरमानों की।
इस प्रकार कवयित्री अपनी 69 रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं के हर पहलू को छूने का सार्थक प्रयास किया है। कवयित्री की लेखनी कभी माँ की महिमा का बखान करते नहीं थकती तो कहीं देश प्रेम का भाव हृदय में भर देती है। कहीं मौसम बसंती में होली खेलती है तो कहीं यादों के सफर में भ्रमण करती है। और फिर मन बंजारे का आह्वान करते हुए लिखती है..

छोड़ जगत के मोह जाल को
वन – वन भटके मन शीत पवन
आ मेरे मन – बंजारे
चलके देखें जग का आँगन

कवयित्री का अपनी बात में यह कहना कि मैं कोई कवयित्री नहीं हूँ इनकी विनम्रता को साबित करता है क्योंकि इनकी प्रत्येक रचना इनकी सृजनशीलता को प्रमाणित कर रही है।
पुस्तक के पन्ने स्तरीय हैं और उसपर छपाई भी स्पष्ट है इस हिसाब से पुस्तक का मूल्य भी 200 सही है । कुल मिलाकर यह काव्य संग्रह पठनीय तथा संग्रहणीय है।
इस संग्रह रोशनी के दीप के लिए मैं कवयित्री प्रीति शर्मा को हार्दिक बधाई देती हूँ और साथ ही इनकी सृजन दीपिका विश्व को रौशन करे अनन्त व अशेष शुभकामनाएँ भी देती हूँ।

किरण सिंह

लेखिका – प्रीति शर्मा
प्रकाशक – सनातन प्रकाशन

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