भगवती देवी 

हाँ भगवती देवी बिल्कुल सटीक नाम है उनका क्यों कि कहाँ बोलतीं हैं भगवती देवियाँ , कहाँ सोचतीं हैं भगवती, कहाँ रोती हैं , देवियाँ! उन्हें तो ज़रा सा अक्षत, फूल, माला, फल, मिठाई चढ़ा दो , खा लो , और फिर बाँट दो उन्हें तो प्रसन्न होकर आशिर्वाद देना ही है क्यों कि वह देवी जो ठहरीं ! अपना धर्म तो निभाना ही होगा उन्हें न? साथ ही अपने नाम तथा यश कीर्ति का खयाल भी रखना होगा !

तभी तो आम जन उनका हँसना – बोलना नाचना – गाना ही देख पा रहे थे उन्हें कहाँ पता था भगवती देवी की अन्तः की पीड़ा कि ये हँसना बोलना तो सिर्फ पीड़ाओं का ओट मात्र है तभी तो ज़रा सा मैंने छेड़ा नहीं कि उनकी हृदय की पीर पिघल कर अश्रु रूप धर बह चली नयनों से और खोल दिये सारे राज जो उन्होंने अबतक सभी से छुपा रखा था! साथ ही फूट पड़े उनके कंठ से स्वर, और इस गीत के माध्यम से उन्होंने काफी कुछ समझा दिया ..
भभूति देखले रे हम जरी गइली हो
जटा देखत जरे छाती जी
सवती देखत मोरे मनवा विलापेला
कइसे गंवइबो दिन राती जी
अर्थात गौरी शिव से कह रही हैं कि भभूत देखकर तो मैं जल भुन गई और जटा देखकर मेरा हृदय, लेकिन सौतन को देखकर मेरा मन विलाप करने लगा कि अब कैसे मैं अपना दिन- रात काटूंगी!
गीत गाते हुए भगवती देवी के आँख से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे फिर भी कोई कितना देर तक रो सकता है इसलिये पुनः वे अपने आँसुओं को पोछकर मुस्कुराते हुए मेरे प्रश्नों का उत्तर देने लगी!
दुबली पतली छोटी कद काठी की गौरवर्णा करीब सत्तर बसंत पार कर चुकी भगवती देवी बहुत ही सहज तथा खुशमिजाज़ महिला लगीं मुझे जिनसे कोई भी व्यक्ति सहज ही प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है ! लेकिन कोई और पति में बहुत फर्क होता है न किसी स्त्री के लिये! स्त्रियों के लिए तो पति की प्यार भरी एक नज़र ही उसे मल्लिकाए हिन्दुस्तान की अनुभूति करा देती हैं उसमें भी उस सदी की महिला की!
पहले विवाह माता-पिता की मर्जी से ही खानदान देखकर होता था और भगवती देवी उँचे कुल खानदान की महिला थीं इसलिए उनका विवाह भी उच्च कुल में एक बहुत ही सुन्दर लम्बे चौड़े नौजवान से हो गया था ! विवाह के कुछ वर्षों तक तो पति पत्नी का सम्बन्ध अच्छा चला जिसके फलस्वरूप उन्हें दो पुत्रियाँ प्राप्त हुईं! किन्तु भगवती देवी के सास ससुर को खानदान चलाने के लिए बेटा चाहिये था क्योंकि बेटियाँ तो दूसरे घर की अमानत होती हैं इसलिये सभी मिलकर भगवती देवी को समझाने लगे कि अपने पति का दूसरा विवाह करा दे! तब तो भगवती देवी एकान्त में जाकर खूब रोईं थीं लेकिन उन्हें तसल्ली थी कि उनके पति ने उनसे ऐसा कुछ भी नहीं कहा था! रात में जब उनके पति उनके कमरे में आये तो भगवती देवी की उदासियों की वजह पूछे तो भगवती देवी ने उन्हें सब कुछ साफ़ – साफ़ बता कर अपने पति की इच्छा भी पूछ लीं!
तब उनके पति महेंद्र तिवारी ने कहा कि माँ पिता जी की बात भी सही ही है और आप तो भगवती हैं प्रसन्न होकर इस घर, कुल – खानदान और मुझपर कृपा कीजिये! उस समय तो भगवती देवी सचमुच पत्थर में ढलकर एक मूरत बन गईं थीं, अचानक उनकी आँखों से आँसू बह चले थे जिन्हे सम्हालने में वह नाकामयाब हो रहीं थीं फिर भी स्वयं को संयमित करते हुए अपने पति से बोलीं साफ – साफ कहिये आपकी क्या इच्छा है..?
महेन्द्र तिवारी – अगर आप मेरा विवाह खुशी – खुशी करवा देतीं हैं तो मेरे माता पिता भी प्रसन्न हो जायेंगे और हमारा वंश भी चलेगा जो बुढ़ापे में हमारा देख भाल करेंगे !
भगवती देवी – तो आप की भी इच्छा है तो ठीक है लेकिन आप मुझे विश्वास दिलाइये कि विवाह के बाद भी आप मुझसे इतना ही प्रेम करेंगे और मेरे मान सम्मान में कमी नहीं आने देंगे!
महेन्द्र तिवारी – विश्वास रखिये आप मेरी पहली पत्नी हैं और आपका स्थान कोई नहीं ले सकता है बल्कि तब तो आपके लिए मेरे हृदय में और भी इज्जत बढ़ जायेगी! स्त्री का भोला मन इतना कह देने मात्र से ही आश्वस्त हो गया और वह अपने पति से वादा कर दीं कि तो ठीक है मैं ढूढूंगी आपके लिए दुल्हन और वह अपने मायके चली गईं अपनी सौतन ढूढने के लिए !
जब भगवती देवी की माँ को इस बात का पता चला तो बोलीं अरे बावरी लड़की ये क्या करने जा रही है तू अपने संसार में खुद ही आग लगाने चली हो ? मैं तुम्हारी माँ हूँ और तुम्हें ऐसा कतई नहीं करने दूंगी!
भगवती देवी – माँ मैं अपने पति से वादा कर आई हूँ मुझे अब विचलित मत करो!
जो जी में आये कर खीजते हुए भगवती देवी की माँ चली गईं!
कुछ दिनों बाद भगवती देवी की सौतन मिल गई और उनके पति का विवाह सुनिश्चित हुआ!
विवाह में भगवती देवी की खुशी और नाचते गाते देखकर सभी को आश्चर्य हो रहा था! कुछ लोग तो उनकी महानता का गुण गा रहे थे तो कुछ उनकी बेवकूफी पर तरस खा रहे थे! खैर खुशी – खुशी विवाह सम्पन्न हुआ! भगवती देवी अपनी सौतन को स्वयं उतारकर कोहबर तक ले गईं!
रस्म रिवाज निभाने के बाद कब उनकी आँख लग गई पता ही नहीं चला! जब उनकी आँख खुली तो रात काफी हो चुकी थी वो जल्दी – जल्दी उठीं… अरे इतना देर तक मैं सोई रह गई उँघते हुए भगवती देवी अपने आप से ही बतियाने लगीं !
तभी उनकी नज़र अपने पलंग के पर पड़ी जिसपर सज धज कर एक खूबसूरत सी दूल्हन तैयार बैठी है ! अपने सुहाग सेज पर सौतन को देखकर भगवती देवी को अपना सिंहासन डोलता हुआ नजर आने लगा! वह किं कर्तव्य विमूढ़ सी बाहर निकलने को हुईं तभी हँसी ठिठोली करते हुए उनके पति महेन्द्र तिवारी को उनकी भौजाइयाँ कमरे में भेज रहीं थीं! महेन्द्र तिवारी की नज़र भगवती देवी पर पड़ी! भगवती देवी के आँखों में आँसू था एक बार तो महेन्द्र तिवारी का मन तो हुआ कि भगवती देवी को रोक लें लेकिन उनकी नई दूल्हन सुहाग सेज पर उनकी प्रतीक्षा कर रही थी और उन्होंने अपने सुहाग कक्ष मे जाकर दरवाजे की कुंडी लगा ली !

2 विचार “भगवती देवी &rdquo पर;

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