कहतीं हैं चित्कार कर

कहतीं हैं चित्कार कर , सूनी – सूनी गोद ।
एक – एक की तुम यहाँ , शिघ्र कब्र दो खोद।

शिघ्र कब्र दो खोद, गाड़ दो दुश्मन का शव।
अब तुम भी इतिहास,जंग का रच दो नव – नव।
आखिर में यह दर्द , किरण भी कैसे सहती।
शब्दों का ही तोप, चलाकर कविता कहती।

जिसने तोड़ी चूड़ियाँ, सूनी कर दी माँग।
उन सबको चुन – चुन चलो , शूली पर दें टाँग।
शूली पर दें टाँग , हुई हद बर्बरता की।
किया हृदय को छिन्न, दानवों ने ममता की।
किरण बिगुल दो फूंक , जंग की चढ़ कर घोड़ी।
करो शत्रु संहार , चूड़ियाँ जिसने तोड़ी।।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s