सुनो सूरज कि मैं हूँ तुम्हारी किरण,

प्यार तुमसे हमेशा मैं करती रही हूँ

तुमपर जी – जी कर तुम पर ही मरती रही हूँ

हो तपन या कि चलती हो शीत लहर,

तुम उगे तो खुशी से मैं खिलती रही हूँ |

शाम ढलते ही आयी ज्यों ही यामिनी,

तो मैं रंग में तुम्हारे ही ढलती रही हूँ |

परिभाषित हुआ प्रेम अपना तभी ,

पथ पर संग तुम्हारे मैं चलती रही हूँ |

सुनो सूरज कि मैं हूँ तुम्हारी किरण,

संग तुम्हारे दिनोदिन निखरती रही हूँ |

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