पुस्तक समीक्षा – प्रेम और इज्जत

मानव मन की सबसे कोमल भावनाओं में से एक है प्रेम | देवता दानव पशु पक्षी कौन है जिसने इसे महसूस ना किया हो | कहा तो ये भी जाता है कि मनुष्य में देवत्व के गुण भी प्रेम के कारण ही उत्पन्न होते हैं | परन्तु विडंबना ये है कि जिस प्रेम की महिमा का बखान करते शास्त्र थकते नहीं वही प्रेम स्त्री के लिए हमेशा वर्जित फल रहा है | उसे प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं है |

मामला स्त्री शुचिता का है | तन ही नहीं मन भी उसके भावी पति की अघोषित सम्पत्ति है जिसे उसे कोरा ही रखना है | बचपन से ही स्त्री को इस तरह से पाला जाता है कि वो प्रेम करने से डरती है | पर प्रेम किसी चोर की तरह ना जाने कब उसके मन में प्रवेश कर जाता है उसे पता ही नहीं चलता | प्रेम होते ही वो घर में प्रेम की अपराधिनी घोषित हो जाती है | कितने ही किस्से सुनते हैं इन प्रेम अपराधिनों के द्वारा आत्महत्या करने के , ऑनर किलिंग के नाम पर अपने ही परिवार के सदस्यों द्वारा मार दिए जाने के या फिर घर से भाग जाने के जिन्हें जिन्दगी भर अपने मूल परिवार से दोबारा मिलने का मौका ही नहीं मिलता | उनका एक हाथ हमेशा खाली ही रह जाता है | वो जीती तो हैं पर एक कसक के साथ |

अब सवाल ये उठता है कि ये जितने किस्से हम सुनते हैं क्या उतनी ही लडकियाँ प्रेम करती हैं ? उत्तर हम सब जानते हैं कि ऐसा नहीं है | तो बाकि लड़कियों के प्रेम का क्या होता है ? वो इज्ज़त के कुर्बान हो जाता है | इज्ज़त प्रेम से कहीं बड़ी है और लडकियां प्रेम को कहीं गहरे दफ़न कर किसे दूसरे के नाम का सिंदूर आलता लगा कर पी के घर चली जाती हैं | वहाँ असीम कर्तव्यों के बीच कभी बसंती बयार के साथ एक पीर उठती है दिल में जो शीघ्र ही मन की तहों में दबा ली जाती है | परिवार की इज्ज़त पर अपने प्रेम को कुर्बान करने वाली ये आम महिलाए जो खुश दिखते हुए भी कहीं से टूटी और दरकी हुई हैं | यही विषय है किरण सिंह जी के नए कहानी संग्रह “प्रेम और इज्ज़त “का | इससे पहले किरण जी की तीन किताबें आ चुकी हैं ये उनकी चौथी पुस्तक व् प्रथम कहानी संग्रह है |

प्रेम और इज्ज़त -पुस्तक समीक्षा

सबसे पहले तो मैं स्पष्ट कर दूँ कि इस संग्रह की कहानियाँ प्रेम पर जरूर हैं पर वो प्रेम कहानियाँ नहीं हैं | कहानियों को पढ़कर रोमांटिक अनुभूति नहीं होती वरन प्रश्न उठते हैं और पाठक अपने अन्दर गहरे उतर कर उनका उत्तर जानना चाहता है | कहानी संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ अपने विषय के अनुरूप ही हैं | इसमें सबसे पहले मैं जिक्र करना चाहूँगी पहली कहानी का , जिसका नाम भी ‘प्रेम और इज्ज़त ‘ही है | यह कहानी एक माँ और बेटी की कहानी है जिसमें माँ परिवार की इज्ज़त के नाम पर अपने प्रेम को कुर्बान कर देती है | वर्षों बाद उसका अपना ही अतीत उसकी बेटी के रूप में सामने आ खड़ा होता है | माँ एक अंतर्द्वंद से गुज़रती है और अंतत: अपनी बेटी के प्रेम को इज्ज़त की बलि ना चढाने देने का फैसला करती है | ये कहानी एक सार्थक सन्देश ही नहीं देती बल्कि एक बिगुल बजा ती है नव परिवर्तन का जहाँ माँ खुद अपनी बेटे के प्रेम के समर्थन में आ खड़ी हुई है | ये परिवर्तन हम आज समाज में देख रहे हैं | आज प्रेम के प्रति सोच में थोड़ा विस्तार हुआ है | पुरातनपंथ की दीवारें थोड़ी टूटी हैं | कम से कम शहरों में लव मेरेज को स्वीकार किया जाने लगा है | परन्तु एक हद तक … और वो हद है जाति या धर्म | जिस दर्द को एक अन्य कहानी इज्ज़त में शब्द दिए हैं |

‘इज्ज़त’ एक ऐसी लड़की नीलम की कहानी है जो शिक्षित है , और अपने समकक्ष ही एक उच्च शिक्षित व्यक्ति से प्रेम करती है , जो उसी के ऑफिस में भी काम करता है | समस्या ये है कि वो व्यक्ति छोटी जाति का है | ये बात उनके परिवार के लिए असहनीय या इज्ज़त के विरुद्ध है | दुखी नीलम का ये प्रश्न आहत करता है कि जिस तरह मन्त्रों से धर्म परिवर्तन होता है क्या कोई ऐसा मन्त्र नहीं है जिससे जाति परिवर्तन भी हो जाए | नीलम की पीड़ा उसकी व्यथा से बेखबर परिवार वाले उसके प्रेम को अंत तक स्वीकार नहीं करते हैं | ये हमारे समाज का एक बहुत बड़ा सच है कि धर्म और जाति की मजबूत दीवारें आज भी प्रेम की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है | कहानी सवाल उठती है और जवाब हमें खुद ही तलाशने होंगे |

कुछ अन्य कहानियाँ है जहाँ प्रेम को स्वयं ही इज्ज़त के नाम पर कुर्बान कर दिया जाता है | जिसमें कल्पना के राजकुमार , बासी फूल ,तुम नहीं समझोगी , गंतव्य , आई लव यू टू और भैरवी हैं | इन सभी कहानियों में खास बात ये है कि एक बार विवाह के बाद दुबारा अपने ही प्रेमी से मिलने पर जब प्रेम के फूल पुन : खिलने को तत्पर होते हैं तो विवाह की कसमें याद कर वो स्वयं ही अपने बहकते क़दमों को रोकते हैं | एक टीस के साथ फिर से जुदा हो जाते हैं | एक तरह से ये भारतीय नारी या भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं | ये हमारे भारतीय समाज की एक बहुत बड़ी सच्चाई है पर पूर्ण सत्य नहीं है क्योंकि अनैतिक संबंध भी हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं भले ही वो सात पर्दों में दबे रहे हैं | हालांकि जैसा की संग्रह के शीर्षक में वर्णित है तो यहाँ लेखिका ने ऐसी ही कहानियों को शामिल किया है जो इज्ज़त को अधिक महत्व देती हैं | उस हिसाब से ये उपयुक्त है |

इसके अतिरिक्त कुछ कहानियाँ हैं जो समाज की समस्याओं को प्रस्तुत करती हैं कई में वो समाधान करती हैं और कुछ में पाठकों को सोचने के लिए छोड़ देती हैं | बाँझ स्त्री की व्यथा को वर्णित करती किराये की कोख, घर से बाहर काम करने वाली स्त्री के मन में अपराधबोध की भावना को दर्शाती ‘माँ कहो ना ‘ , अपने बच्चों को सही समय पर शिक्षा देने और उनकी हर गलती में साथ ना देने की वकालत करती ‘सपोर्ट ‘, विधवा स्त्री के साथ दोयम दर्जे के व्यवहार की और अँगुली उठाती ‘निरुत्तर ‘, धन आते ही बदलते है लोग “चमत्कार “, दहेज़ प्रथाके खिलाफ खड़ी ‘बेटे का ब्याह , जिन्दगी भर आँसू पीने के ऊपर अलग होने के फैसले को सही ठहराती ‘तलाक ‘|बहु और बेटी के बीच अंतर की खायी पर प्रहार करती ‘फर्क और नजरिया “आदि सभी रोचक व् कथ्य अनूरूप हैं |

एक कहानी जिसके ऊपर मैं विशेष रूप से लिखना चाहती थी वो है ‘टाइम है मम्मी ‘ | ये कहानी “अटूट बंधन ‘ पत्रिका में भी प्रकाशित हो चुकी है और मुझे बहुत पसंद है | इसकी खास बात है विषय की ताजगी , अनोखा प्रस्तुतीकरण और एक सार्थक सन्देश | कहानी पिता -पुत्र की बातचीत के माध्यम से आगे बढती है | एक ओर जहाँ पिता बेटे को सफलता का मन्त्र देता है “मेहनत ” वहीँ बेटे का मन्त्र है अपनी रूचि का काम , जहाँ मेहनत … मेहनत ही ना लगे , खेल लगने लगे | बेटे की सफलता उसकी बात को सिद्ध कर देती है | परास्त होने के बाद भी पिता बहुत खुश हैं और कुछ ना बोलकर मुग्द्ध भाव से बेटे की बाते सुनते जा रहे है | माँ के आश्चर्य करने पर बेटा चुटकी लेते हुए कहता है ,”टाइम है मम्मी ” ये कहानी एक खूबसूरत सन्देश देती है कि उसी कम को करो जिसमें मन लगता हो |

आज के समय में जबकि बच्चे माता -पिता की महत्वाकांक्षाओं का शिकार हो कर आत्महत्या जैसा घातक कदम उठाने को विवश हो रहे हैं , इस तरह की कहानियों की बहुत जरूरत है , जो ना सिर्फ बच्चों बल्कि माता -पिता को भी ये समझायें कि हर बच्चा अपने हुनर के साथ पैदा होता है , बेहतर हो उसकी प्रतिभा उसी दिशा में निखारी जाए न कि जहाँ सब दौड़ रहे है उस दिशा में उसे दौड़ने को विवश किया जाए | कुछ ऐसे ही विषय पर थ्री इडियट फिल्म बनी थी जो बहुत सराही गयी थी | लेकिन केवल सराहना से काम नहीं चलेगा , हमें इस दिशा में सोचने की आवश्यकता है |

और अंत में जिस कहानी का जिक्र करुँगी वो है “जमाना बदल गया है | “ये कहानी हालाँकि बीच में है परन्तु मुझे लगता है कि इसे आखिर में होना चाहिए | कई बार सांकेतिक भाषा लिखे हुए शब्दों से ऊपर बोलती है | जमाना बदल गया है कहानी विवाह के ऊपर लिव इन की व्याख्या करती है | हालाँकि लिव इन विवाह से बेहतर है या नहीं ये अभी भी विमर्श का विषय है परन्तु विवाह संस्था में जरूर कुछ खामियाँ हैं जिस कारण आज का युवा लिव इन को तरजीह दे रहा है | परिवर्तन की माँग तभी उठती है जब कुछ खामी हो | क्या ये खामी ही लिव इन की तरफ ले जा रही है | हालांकि लिव इन हमारे समाज में होता रहा है , गाँवों तक में इसके उदाहरण मिल जाते हैं , परन्तु इसके लिए जो शब्द इस्तेमाल होता था वह स्त्री के लिए अपमान सूचक है | आज शहरों में लिव इन की लहर चली है |युवा विवाह से पहले अपने भावी जीवन साथी को शारीरिक मानसिक हर तरीके से परख लेना चाहते हैं | ताकि किसी तरह का कमिटमेंट करने से पहले वो उस रिश्ते की लम्बी उम्र के प्रति आश्वस्त हो |

क्योंकि पहली कहानी “प्रेम और इज्ज़त ” और आखिरी ( मेरे विचार से )” जमाना बदल गया है ” जिसमें पहली में माँ बेटी के प्रेम को इज्ज़त के नाम पर दांव लगाने से रोकती हैं वही आखिरी में बेटी के लिव को स्वीकार करती है | ये दोनों कहानियाँ संकेत देती हैं कि प्रेम को इज्ज़त के नाम पर कुर्बान किया जाता रहा है पर अब ये नहीं चलेगा | अब नहीं चलेगा कि स्त्री कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ते हुए अपनी भावनाओं की हत्या करे | अब नहीं चलेगा कि पति -पत्नी के बीच एक घुटे हुए प्रेम की सिसकियाँ सुनाई दें | इस मामले में लेखिका युवा पीढ़ी के साथ खड़ी दिखाई देती है | क्योंकि यही आज के समाज का सच है …. आज का समाज प्रेम को स्वीकार करने और घुटन भरी जिन्दगी को नकारने पर आमादा है | और सही भी है क्योंकि प्रेम जब तक भावना के स्तर पर है तब तक तो इज्ज़त के नाम पर कुर्बान किया जा सकता है , लेकिन जब उसमें शरीर की घालमेल हो जाती है तो रिश्ते बहुत उलझ जाते है | पिया के घर में तन -मन में किसी को बसा के जाना एक तरह से धोखा है | बात केवल शुचिता की ही नहीं है विश्वास की ही है | आज जिस तरह प्रेम में सिर्फ भावनाओं को ही नहीं शरीर को भी बहुत तरजीह दी जाती है , ये आवश्यक भी है | नयी पीढ़ी इन पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहती है | आज विवाह भावी जीवन साथी को अपने पुराने रिश्तों के बारे में बता कर हो रहे हैं | वो लिव इन के बारे में भी खुले में बात करती है | यह नया समाज बन रहा है … इसका क्या परिणाम होगा इसे समय पर छोड़ देना बेहतर है |

किरण सिंह एक अच्छी लेखिका है | उनके काव्य प्रतिभा के तो पाठक मुरीद हैं ही , ये उनका पहला कहानी संग्रह है जिसमें उन्होंने विषय के साथ न्याय करने का पूरा प्रयास किया है | इसके लिए वो बधाई की पात्र हैं | मेरे विचार से कुछ कहानियाँ विस्तार मांगती हैं जैसे कि जैसे कि ‘ सुहाग चिन्ह के चमत्कार ‘| इसमें पति -पत्नी के बीच तलाक होने जा रहा था | परन्तु पत्नी सुहाग चिन्ह पहन कर कोर्ट में जाती है | पति उसे देखता है और उसकी ओर आसक्त हो जाता है और तलाक रुक जाता है | इसमें स्पष्ट नहीं होता कि क्या उनके बीच विवाद का कारण पत्नी द्वारा सुहाग चिन्ह धारण ना करना था ?

संग्रह में २२ कहानियाँ है | जो १०८ पृष्ठों में समाई हैं | सभी की भाषा सरल और सीधे पाठक से संवाद करने वाली है | अगर आप यथार्थ प्रेम कहानियाँ पढना चाहते हैं तो ये संग्रह आपके लिए अच्छा विकल्प है | क्योंकि असली जीवन में सदा प्रेम की परणीती मिलन में नहीं होती |
कवर पृष्ठ सुन्दर है जो प्रेम के भावो को स्पष्ट करता है परन्तु इज्ज़त जो संग्रह का मुख्य विषय है को चित्रित करने में चूक जाता है | संग्रह अयन प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है | इसकी एक और खास बात है … इसका त्रुटी हीन संपादन | संग्रह में शब्द या मात्रा की गलतियां नहीं मिलती और पढने का आंनद बना रहता है |

प्रेम और इज्ज़त -कहानी संग्रह
लेखिका -किरण सिंह
प्रकाशक -अयन प्रकाशन
पृष्ठ -१०६

वंदना बाजपेयी

2 विचार “पुस्तक समीक्षा – प्रेम और इज्जत&rdquo पर;

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s