#एक #चिट्ठी #साहित्यकार #भाइयों #एवम् #बहनों #के #नाम!

प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में भावनाएँ मचलती रहतीं हैं और जैसे ही व्यक्ति शब्दों के माध्यम से उन्हें अभिव्यक्त करने की कला सीख लेता है तो उन्हीं भावनाओं को शब्दों में ढालकर गीत, गज़ल और कविता का रूप दे देता है । और जब सृजन खूबसूरत हो जाता है तो उस सृजन कर्ता को जो तुष्टि का आभास होता है उसे शब्दों में बयाँ करना थोड़ा कठिन जरूर है।

अतः यदि आपकी भावनाएँ शब्दों में ढलने को आतुर हैं और आप ढाल सकतें हैं तो अवश्य ढालने का प्रयास करें टेढ़े-मेढ़े ही सही, क्योंकि अभ्यास से धीरे – धीरे आपकी रचनाएँ निखरने लगेंगी। फिर जब आप स्वयं अपनी रचनाओं से तुष्ट हों तो उन्हें प्रकाशन हेतु पत्र – पत्रिकाओं में अवश्य भेजें ताकि आपकी रचनाएँ जन मानस तक पहुँच पाएँ और उनका मूल्यांकन हो सके।
अधिकांश लेखक लेखिकाओं को यह भ्रम रहता है कि पत्र पत्रिकाओं में उन्हीं की रचनाएँ प्रकाशित होतीं हैं जिनसे सम्पादक तथा प्रबंधक की जान – पहचान होती है। इस कथ्य को शिरे से खारिज तो नहीं किया जा सकता है क्योंकि नये – नये पत्र पत्रिकाओं में ऐसा करना पड़ता है किन्तु स्थापित पत्र – पत्रिकाओं में ऐसा नहीं होता उन्हे आपकी रचनाएँ पसंद आ गयीं तो वह अवश्य प्रकाशित करते हैं। हाँ यदि दो चार भेजने पर भी नहीं छपी तो हतोत्साहित न हों क्यों कि हर असफलता यह बताती है कि किया गया प्रयत्न पर्याप्त नहीं था। आप यत्न करते रहें क्यों कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

अब बात आती है साहित्यिक संस्थानों से जुड़ने की तो सीखने सिखाने तथा अभिव्यक्ति के लिये एक मंच तो होना ही चाहिए इसलिए आप जुड़ें जरूर हाँ यह देख लें कि वहाँ कहीं आपका अधिक आर्थिक शोषण तो नहीं हो रहा है न क्यों कि साहित्यिक माफियाओं का भी काफी बोल बाला है साहित्य क्षेत्र में और हो भी क्यों नहीं अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति स्वयं छपने और पुरस्कार पाने के लालच में स्वयं फंस रहे हैं।

आजकल साहित्य के गणमान्य जनों के बीच छपास की बिमारी के विषय पर काफी परिचर्चा चल रही है कुछ तो धड़ल्ले से कटाक्ष भी कर रहे हैं लेकिन इन बातों को लेकर आप हतोत्साहित बिल्कुल भी न हों। हमेशा आलोचना को चुनौती के रूप में लें और अपने आप को मजबूती से प्रस्तुत करें इस विश्वास के साथ कि जो आज आपकी आलोचना कर रहे हैं वो कल आपकी प्रशंसा अवश्य करेंगे।
अपना संग्रह तभी छपवायें जब आप अपनी रचनाओं से स्वयं तुष्ट हो जायें मगर हाँ पुस्तकें बिकेंगी ही इस उम्मीद में पुस्तक प्रकाशित कतई न करवायें और न ही पुस्तक प्रकाशित हो जाने के बाद अपनी पुस्तक खरीदने के लिए गुहार लगायें। अपनी पुस्तक पुस्तकालयों, प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं, दूरदर्शन केन्द्र, आकाशवाणी तथा कुछ गणमान्य साहित्यक गण एवम् इष्ट मित्रों तक अवश्य प्रेषित करें ।
इतना याद रखें कि प्रशंसा अगर संवारती है तो आलोचना हमें निखारती है।
और हाँ साहित्यिक गणमान्य व्यक्तियों से भी कर जोड़ कर आग्रह है कि यदि आप किसी साहित्यकार या साहित्यकारा को सही दिशानिर्देश या फिर प्रोत्साहन नहीं दे सकते हैं तो कृपया हतोत्साहित भी न करें। आपको तो इस बात से प्रसन्नता होनी चाहिए कि आज हमारी नई पीढ़ी का भी हिन्दी के प्रति रुझान बढ़ रहा है।

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