तोड़ कर सारे बंधन

मेरे भी कब्र पर बनते ताज पर ,
इश्क मेरा भी होता जांबाज गर |

तोड़ कर सारे बंधन चली आती मैं,
दी होती मुझे तुमने आवाज़ गर |

रंग जम जाते महफिल में और भी,
गीतों के संग होते तेरे साज गर |

और भी होती मेरी मुकम्मल गज़ल,
पता होता दिलों का मुझे राज गर |

दिखला देती मैं भी करिश्मे कई,
लगता इश्क का मुझे अंदाज गर |

उड़ आती तुम्हारे शहर में अभी ,
बना देता खुदा मुझे परवाज़ गर |

मर जाती किरण खुशी के मारे तब ,
करते तुम भी मुझ पे नाज़ गर |

3 विचार “तोड़ कर सारे बंधन&rdquo पर;

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