दीपों की वरमाल

लिये हाथ में यामिनी,
दीपों की वरमाल |
खुद अपने ही रूप पर ,
होने लगी निहाल |

होने लगी निहाल,
स्वयंवर में आई जब |
स्वप्न हुआ साकार,
सभी उसका सुन्दर सब |
कहे किरण हे चन्द्र ,
सजाना सेज रात में |
खड़ी सिंदूरी थाल,
यामिनी लिये हाथ में ||

जग – मग, जग – मग, जग हुआ,
तिमिर रूठ कर जाय |
विजयी होकर दीपिका ,
कहो न क्यों इतराय ||
कहो न क्यों इतराय,
सखी सुन मोरी बतिया |
नीयति अपनी जान ,
जले है सारी रतिया |
सही किरण हर दर्द ,
स्वयं पर हुईं न डग – मग |
करतीं हैं उजियार,
बत्तियाँ जल कर जग – मग ||

4 विचार “दीपों की वरमाल&rdquo पर;

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