ढूंढते – ढूंढते

बहुत याद आती है गीता की! सन 1981, में नवी कक्षा से ही हम दोनों की दोस्ती हुई थी ! गीता बला की खूबसूरत थी इसीलिए शायद नज़र बचाने के लिए ईश्वर ने उसके नाक पर एक तिल लगा दिया था साथ ही पढ़ने में भी अव्वल थी इसलिए हर कोई उससे दोस्ती करना चाहता था लेकिन मैं खुश नसीब थी इसलिये वो मेरी पक्की सहेली बन गई ! हमारी दोस्ती की चर्चा पूरे स्कूल में थी कुछ लड़कियों को तो इर्ष्या भी होती थी हमारी दोस्ती को देखकर !

घर में मैं जब भी अपनी दोस्ती की बखान किया करती थी तो माँ कहती थीं कि इस उम्र में सभी को अपनी दोस्ती ही सबसे खूबसूरत लगती है लेकिन समय के साथ – साथ सब कुछ बदल जाता है और सभी अपनी – अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं तब मैं बड़े ही दृढ़ता के साथ कहती थी कि हमारी दोस्ती ताउम्र यूँ ही बनी रहेगी माँ ! लेकिन इसके विपरीत गीता के घर मैं जब कभी भी जाती थी तो उसकी मम्मी हमेशा ही कहा करतीं थीं कि देखो बेटा दोस्ती बहुत ही किस्मत वालों को अच्छी मिलती है और तुम दोनों वाकई किस्मत वाली हो! जिंदगी में बहुत से दोस्त मिलते हैं लेकिन इस उम्र की दोस्ती पक्की और निश्छल होती है! चूकि गीता का घर मेरे स्कूल के बगल में ही था तो मैं स्कूल की छुट्टी होने के बाद अक्सर ही उसके घर चली जाया करती थी और आँटी कुछ न कुछ अच्छा बनाकर रखती थीं जिसका स्वाद आज तक याद है मुझे!बारहवीं कक्षा तक हम साथ पढ़े उसके बाद उसके पापा का बलिया शहर से स्थानांतरण हो गया! उसके जाने के बाद मुझे कहीं मन नहीं लग रहा था तब सहारा बनी थीं चिट्ठियाँ!

मेरा काॅलेज में ऐडमिशन हो गया और जब मैं स्नातक द्वितीय वर्ष में थी तभी मेरी शादी भी पक्की हो गई थी! चूंकि सभी सहेलियों में सबसे पहले मेरा ही विवाह हो रहा था इसलिये सभी सहेलियों में उत्सुकता थी लेकिन मेरा मन तो गीता को ढूंढ रहा था तभी विवाह के एक दिन पूर्व डाक से एक पार्सल आया! पार्सल में गीता का नाम देखकर मैं खुश तो हुई लेकिन साथ ही दुखी भी कि विवाह में गीता नहीं आ पायेगी लेकिन इसमें उसका कोई दोष भी तो नहीं था क्योंकि तब लड़कियों को अपने ही शहर में हो रहे सहेलियों के विवाह में रात में रुकने की इजाजत नहीं होती थी तो किसी अन्य शहर में जाना भला कैसे सम्भव हो सकता था!
विवाह के बाद भी गीता की चिट्ठी आती थी और मैं भी प्रतिउत्तर देती थी लेकिन एकबार मैं ट्रेन से बहरहरवा जहाँ पर पति देव की पोस्टिंग थी से बलिया वापस आ रही थी तो सूटकेस से मेरा पर्स चोरी हो गया जिसमें मेरे कुछ गहने, पैसे, सारी चिट्ठियाँ, ग्रीटिंग्स, डायरी आदि सहेज कर रखी हुई थी ! तब मैं बहुत दुखी हुई थी! चूकि डायरी में ही सभी का पता लिखा हुआ था इसलिये मैं गीता को चिट्ठी नहीं लिख पाई और ना ही गीता का कोई पत्र आया! उसे ढूढने की काफी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाई! लेकिन उसकी यादों को मुझसे कोई भी नहीं चुरा सका!
यह बात जब मैं अपनी बहन रागिनी को बताई तो उसने मेरी एक फेसबुक प्रोफाइल बनाने की सलाह दी! फिर मैंने कहा कि मुझे यह सब फालतू काम नहीं करना है इससे तो अच्छा मैं खाली समय में सितार बजाऊँगी! तब रागिनी ने कहा कि आपके विचार बहुत अच्चे होते हैं हो सकता है कि इस मंच पर आपके ढेरों फालोअर्स हो जायें साथ ही आप अपनी सहेली गीता को भी सर्च करके ढूंढ सकतीं हैं या फिर वे ही आपको ढूंढ लें! इस बात पर मैं हाँ कह दी और उसके बाद शुरू कर दी गीता को ढूढना! फिर एक औरत गीता सी दिखी भी जिसके नाक पर तिल था तो मैंने उसके मैसेन्जर पर मैसेज किया लेकिन उसका कोई उत्तर नहीं आया क्यों कि वो एक्टिव भी नहीं रहती थी!

उसके बाद मैं फेसबुक पर कुछ – कुछ लिखना शुरू कर दिया जिसे लोगों ने इतना अधिक सराहा कि मैं और भी लिखती गई! मेरे मित्रों और फालोअर्स की संख्या बढ़ती गई, पत्र पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं, मेरी पुस्तकें भी प्रकाशित होने लगीं ! दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से भी मेरी रचनाओं का प्रसारण होने लगा और मैं किरण से लेखिका किरण के रूप में स्थापित हो गई!

मैं तो फेसबुक मंच पर गीता तो ढूँढने आई थी पर यहाँ भी मैं गीता को तो नहीं ढूँढ पाई पर हाँ गीता को ढूंढते – ढूंढते स्वयं को अवश्य ली ढूँढ जिसे विवाह के पश्चात भूल गई थी मैं ! साथ ही बहुत से अच्छे – अच्छे मित्रों को भी ढूंढने में कामयाब रही जिनसे पिछले जन्म में कुछ न कुछ अनुबंध तो अवश्य ही रहा होगा!

2 विचार “ढूंढते – ढूंढते&rdquo पर;

  1. वैसे तो खुद को खोजना ही सबसे अच्छा है , शायद कभी गीता भी मिल जाए पर आपकी गीता की खोज में हमें “किरण ” मिली … दोस्ती का एक सुखद अहसास , फेसबुक से शुरू हुए ही सहीपर मित्रता के रिश्ते पूर्व निर्धारित होते हैं

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