अदृश्य हमसफर

प्रेम एक ऐसी खूबसूरत भावना है जो कभी भी किसी के लिए भी अचानक जागृत होकर उसके हृदय के तार को झंकृत कर जीवन को संगीतमय कर देती है! तूलिका प्रिय – प्रियतमा मन कैनवास पर प्रीत का रंग भर देतीं हैं जिसकी खूबसूरती प्रिय तथा प्रियतमा की नज़रें ही देख सकतीं हैं, हृदय महसूस कर सकता है, मन बावरा हो जाता है ! किन्तु विडम्बना यह है कि इतने खूबसूरत भाव को समाज की नजरों से छुपाना पड़ता है प्रेमी – प्रेमिकाओं को क्यों कि समाज की नजरों में सदियों से प्रेम एक गुनाह रहा है जिसकी सजा सदियों से प्रेमी प्रेमिका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भुगतते आ रहे हैं!

फिर भी प्रेम तो प्रेम है हो ही जाता है बिना परिणाम की परवाह किये हुए क्यों कि दिल तो पागल होता है न लेकिन जब दिल पर मति हावी हो जाती है तब हृदय को मजबूर होकर संस्कार, संस्कृति तथा सभ्यता की बलि वेदी पर प्रेम की बलि चढ़ाना ही पड़ता है!

कुछ ऐसी ही प्रेम कहानी है लेखिका विनय पंवार द्वारा लिखित उपन्यास अदृश्य हमसफर की ! जिसमे अनुराग को ममता से पहली ही नज़र में पहला प्यार हो जाता है जिसे वह सबसे छुपाए रखा है क्योंकि अनुराग के दिल पर दिमाग हावी हो जाता है परिणाम स्वरूप प्रेम हृदय में ही दबा रह जाता है जिसे उसकी प्रियतमा ममता तक नहीं समझ पाती है उसके प्रेम को ! फिर भी कहते हैं न कि खैर, खून, खाँसी, खुशी छुपाए से नहीं छुपती किसी न किसी की पारखी नज़र तो प्रेम को परख ही लेतीं हैं तभी तो बाबा की अनुभवी नज़र अनुराग के दिल की किताब पढ़ लेतीं हैं! बाबा किसी भी तरह से अनुराग को समझा बुझाकर उसकी शर्तों को मानते हुए उसकी शादी एक संस्कारी लड़की देविका से करवा देते हैं जो कि अनुराग की पूजा करती है!
वह अनुराग के प्रेम के बारे में जानते हुए भी कभी भी उसके मन में ईर्ष्या नहीं पनपती है जो देविका को आम पत्नियों से परे एक असाधारण स्त्री के रूप में प्रस्तुत करती है जिसका प्रेम पूजा की तरह होता है !
ममता के चौवनवे वर्ष के उम्र में अनुराग के द्वारा पहले प्रेम का पहली बार इज़हार कहानी को कुछ अलग ही मोड़ पर ले जाता है! कहानी में मानवीय संवेदनाओं को अच्छी तरह से उकेरा गया है!

यथा – चुप कर पगली, जानता हूँ कि तू यही कहेगी कि मेरे मनोहर जी तो एक बहुत खुले विचारों वाले व्यक्ति थे पर सुन हर पुरुष के दो व्यक्तित्व होते हैं! एक सभी के लिए और दूसरा सिर्फ अपनी पत्नी के लिए! और कोई भी पति अपनी पत्नी के जीवन में किसी दूसरे पुरुष का दखल सहन नहीं कर सकता भले ही वह उसका सगा भाई ही क्यों न हो……………..

कहानी में शुरु से लेकर अंत तक रोचकता बनी हुई है! भाषा इतनी सरल है कि पढ़ते हुए कहीं भी मन बोझिल नहीं होता ! कौतूहल बना हुआ है जिससे जब तक पाठक पूरी कहानी पढ़ नहीं लेता उसे चैन नहीं मिलता!
कहानी में जहाँ भारतीय संस्कृति, सभ्यता, रीति – रिवाजों तथा संस्कार को प्राथमिकता दी गई है वहीं सामाजिक कुरीतियों पर हल्के से बहुत गहरा प्रहार भी किया गया है जो समाज को दिशानिर्देश भी दे रहा है जो इस कहानी का सार्थक एवम् सशक्त पहलू है!

यथा – छोटी भाभी उठकर अंदर गईं और वापस आकर एक छोटी सी बिंदी ममता के माथे पर लगा दीं!
छोटी भाभी के उठाए इस कदम ने वहाँ बैठी बड़ी – बुढ़ियों को बोलने का अवसर दे दिया!
ये विधवा हो चुकी है, बिंदी का हक नहीं रहा इसे! कुलच्छनी ये क्या कर डाला?
लेकिन छोटी भाभी टस से मस नहीं हुईं!
उसके बाद भतीजी की शादी में जब रस्में निभाने की बारी आई तो भी…..
ममता हिचकिचाहट में दबी आवाज़ में कह उठी थी – अब वह बात नहीं रही सुनीता! लोग क्या कहेंगे..? शगुन की रस्में एक विधवा निभा रही है? नहीं – नहीं अपनी अनु के साथ कभी कुछ बुरा हो मैं तो सोच भी नहीं सकती! मुझसे न होगा भाभी!
सुनीता ममता के मुंह पर पर हाथ रख दी और बोली न दीदी प्यार और आशिर्वाद शगुन अपशगुन को नहीं जानते वह तो सच्चे दिल से निकली दुआएँ होतीं हैं और आपसे बढ़कर अनु का खैरख्वाह कौन हो सकता है ……..!

चूंकि यह लेखिका का पहला उपन्यास है तो लेखन में थोड़ी सी जल्दबाजी दिखी जो कि स्वाभाविक है! लेकिन कहानी इतनी रोचक और सशक्त है कि इस तरफ़ ध्यान कम ही लोगों का जा पायेगा ! लेकिन हमें पूर्ण विश्वास है कि लेखिका में उत्कृष्ट लेखन क्षमता है जिसे हम उनके आने वाले अगले उपन्यास में देख सकेंगे!
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह उपन्यास पठनीय तथा संग्रहणीय है ! कीमत भी मात्र एक सौ निन्यानवे (199 ru) है जिसे Amazon से भी मंगाया जा सकता है!
मैं इस उपन्यास के लिए लेखिका को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ देती हूँ कि वह निरन्तर अपने लेखन से साहित्य जगत को एक नया आयाम दें!

किरण सिंह

लेखिका – विनय पंवार
प्रकाशक एवम् मुद्रक – कौटिल्य बुक्स

7 विचार “अदृश्य हमसफर&rdquo पर;

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