जीवित पुत्रिका व्रत कथा

जीवित पुत्रिका व्रत अनु्ष्ठान काशी ही नहीं वरन पूर्वांचल का बड़ा और अहम् पर्व माना जाता है। काशी में महालक्ष्मी दरबार के सानिध्य में तो सर्वाधिक पूजनार्थी जुटते हैं, इसके अलावा ईश्वरगंगी, शंकुल धारा तालाब, मंडुवाडीह बाजार सहित सभी कुंडों व तालाबों पर आज के दिन सूर्य के अस्त होते समय व्रती महिलाएं जुटती हैं। गंगा तट पर भी व्रती महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि इस जीवित पुत्रिका व्रत पर्व को पूरी आस्था और धर्मग्रंथों में वर्णित रीति रिवाज के अनुसार व्रत व पूजन करने से कुल की वृद्धि होती है। पुत्र-पौत्रादि को दीर्घायु प्राप्त होती है।

इस महान व्रत पर्व के बारे में धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णन किया गया है। जीवित पुत्रिका व्रत कथा के अनुसार नैंमिषारण्य निवासी ऋषियों ने सूत जी से पूछा था कि कलियुग में बालक कैसे दीर्घायु होंगे। इस पर उन्होंने एक कथा सुनाई थी जिसके तहत गौतम ऋषि से कुछ स्त्रियों ने भी यह पूछा था कि वे कौन सा उपाय करें कि उनकी संतानों को दीर्घायु प्राप्त हो। इस पर गौतम ऋषि ने बताया था कि महाभारत युद्ध के दौरान द्रोणपुत्र अश्वस्थामा पुत्र द्वारा समस्त पांडु पुत्रों की हत्या कर दी गई थी जिसे देख कर पांडव काफी विचलित हुए। तब द्रौपदी ने पुत्र शोक में धौम्य ऋषि से उन मृत पांडव पुत्रों की चर्चा करते हुए इसके निराकरण का उपाय पूछा था। उस वक्त धौम्य ऋषि ने बताया कि कलिकाल में अयोध्या में जीमुत वाहन नाम का राजा था। एक दिन आधी रात को जब वह शयन कर रहा था तभी एक महिला का रुदन सुन कर खुद को रोक न सका और उसके पास पहुंच कर रुदन का कारण पूछा तो महिला ने बताया कि शहर में गरुड़ राज रोजाना हम सभी के बालकों को खा जाते हैं। शहर की हर महिला बहुत दुःखी हैं कि किस तरह से उनके बच्चों को दीर्घ जीवन मिले। इस पर राजा जीमुत वाहन ने महिला से वह स्थान पूछा जहां गरुड़ बच्चों को खाते हैं। फिर वह खुद उस स्थान पर पहुंचे। राजा जब वहां पहुंचे उसके थोड़ी ही देर के बाद गरुड़ जी आए और बच्चों को खा गए। फिर राजा पर भी हमला बोला और उनका बायां अंग खा गए। इस पर राजा ने अपना दहिना अंग भी उनके सामने कर दिया तो गरुड़ ने पूछा आप अपना परिचय दें, आप आम इंसान नहीं। इस पर काफी कुरेदने पर राजा ने अपना परिचय दिया। इस पर गरुड़ ने उनसे वर मांगने को कहा तो राजा ने कहा कि आपने अब तक जितने बच्चों को खाया है वो सभी फिर से जीवित हो जाएं और राज्य के सभी बच्चों को दीर्घ आयु प्राप्त हो। इस पर गरुड़ ने राजा की मांग को स्वीकार करने का वचन दिया। फिर अमृत लेकर आए और उन सभी बच्चों के कंकाल पर उसे छिड़का जिससे सभी बच्चे जीवत हो उठे। उस दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि थी। उसी दिन गरुड़ ने राजा से कहा कि भविष्य में भी इस तिथि विशेष को जो भी महिला अपने बच्चों की दीर्घायु के लिए यह व्रत करेगी और आपकी पूजा करेगी उसके बपुत्रओं को दीर्घायु अवश्य प्राप्त होगा। जीवित पुत्रिका व्रत कथा में यह भी वर्णित है कि जिस वक्त धौम्य ऋषि यह कथा सुना रहे थे उसे एक चील्ह और एक सियार ने भी सुना। चील्ह ने उस व्रत का पालन किया और अगले दिन नवमी तिथि में शिवालय में पहुंच कर दूध पी कर व्रत तोड़ा जबकि सियार को कथा सुनते-सुनते ही भूख लग गई और वह शिकार पर निकल गई। उसने शिकार खाया। इसके कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। अगले जन्म में उन दोनों ने अयोध्या में ही एक वणिक परिवार में जन्म लिया। दोनों काफी सुंदर थीं। ऐसे में बड़ी बेटी (सियारिन) का विवाह काशिराज परिवार में हुआ और वहीं छोटी बेटी (चील्ह) का विवाह मंत्री से हुआ। बड़ी बेटी यानी रानी को जितने भी पुत्र होते कुछ दिन बाद उनका निधन हो जाता, जबकि मंत्री की पत्नी ने आठ सुंदर और सुडौल बच्चों को जन्म दिया। उन्हें देख रानी को ईर्ष्य़ा हुई उन्होंने पति से उन सभी बच्चों को मार डालने को कहा। राजा ने कई बार यह यत्न किया पर हर बार मंत्री पत्नी अपने जीवित पुत्रिका व्रत के चलते उन्हें बचा लेतीं। यहां तक कि एक बार सभी बच्चों का सिर काट कर उन्हें झपोली में रख कर मंत्री पत्नी को भिजवा दिया गया। लेकिन वे सिर आभूषण में तब्दील हो गए और बच्चे हृष्ट-पुष्ट रहे। इस पर रानी ने छोटी बहन से कारण पूछा तो उसने पूर्व जन्म की कहानी सुनाई और कहा कि अब से भी जीवित पुत्रिका व्रत रखो तो सभी पुत्र बच जाएंगे और उन्हें दीर्घायु प्राप्त होगी। छोटी बहन के कहने पर रानी ने वह व्रत किया और तब से उसके सभी बच्चों को दीर्घायु पाप्त हुई!

महाभारत युद्ध के बाद अश्वथामा अपने पिता के मरने पर शोकाकुल था. उसने इसका बदला लेने की ठान ली और पांडवों के शिविर में पहुंच कर उसने वहां सो रहे पांच लोगों की हत्या कर दी. उसने सोचा कि पांचों पांडवों की उसने हत्या कर दी. लेकिन तभी उसके सामने पांचों पांडव आकर खड़े हो गए. दरअसल, जिन पांच लोगों की उसने हत्या की थी वे द्रोपदी के पुत्र थे. अर्जुन ने अश्वथामा को बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि उससे छीन ली.

अश्वथामा के बदले की आग और बढ़ गई और उसने उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया. ब्रह्मास्त्र के मार को निष्फल करना नामुमकिन था, इसलिए भगवान कृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को अपना सारा पुण्य दे दिया और गर्भ में ही दोबारा उत्तरा की संतान को जीवित कर दिया.

गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवितपुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्ष‍ित बना. तब ही से इस व्रत को किया जाता है.

उसके बाद से ही यह व्रत लगातार हर साल आश्विन कृष्ण अष्टमी को महिलाएं बच्चों की दीर्घायु के लिए यह कठिन व्रत करती हैं। इस व्रत से पहले रात ( सप्तमी तिथि) में चील्ह और सियार के नाम से पकवान (मीठी पूड़ी और सतपुतिया की सब्जी आदि) रखा जाता है उसके बाद स्वयं भी खाया जाता है!
अष्टमी तिथि को निर्जल व्रत रखकर नवमी तिथि में पारण किया जाता है !

4 विचार “जीवित पुत्रिका व्रत कथा&rdquo पर;

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