झूठी हो गर दुआएँ

झूठी हो गर दुआएँ तो फलतीं नहीं ,
पानी खारा हो तो दाल गलती नहीं |

सतह पर नमी हो अगर रगड़ो कितना ,
तिल्लियाँ भी माचिस की जलतीं नहीं |

आह निकले भी तो कैसे किस जख्म पर,
दिल में जख्मों का जब कोई गिनती नहीं |

जल रहीं बस्तियाँ उठ रहा है धुआँ,
रुख हवाओं की फिर भी बदलती नहीं |

आत्माएँ भी सहमी सी दुबकी हुई हैं,
मारे डर के वो भी अब भटकती नहीं |

वक्त ने कर दिया है बड़ा अब हमें,
मन चिरैया तभी तो चहकती नहीं

कह देती किरण कभी कुछ – कुछ यूँ ही,
भावनाएँ सम्हाले सम्हलती नहीं |

झूठी हो गर दुआएँ&rdquo पर एक विचार;

  1. पिंगबैक: झूठी हो गर दुआएँ – Gaun gram, shahar

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