लालिमा फिर छा रही है

लालिमा फिर छा रही है,
शाम ढलकर आ रही है |

चन्द्रमा से कर सगाई ,
चाँदनी इतरा रही है!

रागिनी आकर खुशी से,
गीत मंगल गा रही है!

कामिनी अपनी सखी को,
धीरे से समझा रही है |

प्रीत की कुछ रीतियाँ ,
वे प्यार से बतला रही है!

चाँद तो है हर किसी का ,
हक ज़रा जतला रही है!

जल बुझी तब चाँदनी पर ,
मन्द – मन्द मुसका रही है!

फिर आऊँगी करके वादा ,
यामिनी फिर जा रही है!

लो सुबह सौगात लेकर,
दामिनी फिर आ रही है!

श्वेत चमचम ओढ़ चादर ,
किरणें खिलखिला रहीं हैं!

14 विचार “लालिमा फिर छा रही है&rdquo पर;

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