नभ भी घुट घुट जी रहा है

बात मन की क्यों बताऊँ
पीर अपनी क्यों जताऊँ
अश्रु अपना पी रहा है
नभ भी घुट – घुट जी रहा है

कौन मेरी सुनने वाला
अब कहाँ कोई गुनने वाला
कर हृदय पाषाण वो भी
होठ अपना सी रहा है
नभ भी घुट – घुट जी रहा है

यादें फिर – फिर हैं सताती
चिट्ठियाँ अब क्यों न आती
भावनाएँ सो गई हैं
या कि कंटक बो गईं हैं
वो समझ नहीं रहा है
नभ भी घुट – घुट जी रहा है

अब नहीं रहे सपूत
पूत हो गये कपूत
वाण से हैं बेधते
मुझको हरदम छेदते
कहें तो कर सही रहा है
नभ भी घुट – घुट जी रहा है

कैसे उर धीरज बँधाए
कौन अब मल्हार गाये
नहीं झूलतीं गोरी झूला
प्रिय लगता है भूला भूला
जो प्राण प्रिय कभी रहा है
नभ भी घुट – घुट जी रहा है

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