उचर रहा छज्जे पर कागा

उचर रहा छज्जे पर कागा , कोयलिया सुर में गाई है |
जानी पहचानी सी खुशबू , लेकर पुरवाई आई है |

घड़ी दो घड़ी चैन न आवै, द्वारे बार बार मैं जाऊँ |
शायद साजन ने मुझको फिर , कोई चिट्ठी पिठवाई है |

दिन रैन किया नैन प्रतीक्षा , आस मिलन की मन में लेकर |
लेकिन जब भी नयन मिले तो, जाने क्यों खुद सकुचाई है |

काग़ज कलम लिये मैं बैठी , छलके हैं नयनो से आँसू
लिख दी मैं भी उनको चिट्ठी, जब उनकी याद सताई है |

मैं तो तेरी प्रेम दिवानी, सुनो सजन मैं तुम पे वारी |
ढल जाऊँगी गलकर तुममें , खुद से ही किया लड़ाई है ||

2 विचार “उचर रहा छज्जे पर कागा&rdquo पर;

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