अनवरत

प्रेम धरा अम्बर का
चिर काल से चला है,
आदि काल तक चलेगा

जब बढ़ता है प्रेम ताप
हो जाता है ठोस द्रव ,
पिघलता है गगन
होती है वर्षा
खिल जाती है धरा
भूल जाती है पीर
क्यों कि
स्त्री है न
सारी शिकायतें
खत्म कर लेती है
क्यों कि समझ लेती है
मजबूरियाँ
सह लेती है
दूरियाँ
यह प्रक्रिया
चलता रहा है
और चलता
रहेगा
अनवरत

5 विचार “अनवरत&rdquo पर;

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