अतिथि तुम कब………

आजकल अधिकांश लोगों के द्वारा यह कहते सुना जाता है कि आजकल लोग एकाकी होते जा रहे हैं , सामाजिकता की कमी होती जा रही है, एक पहले का जमाना था जब अतिथि को देव समझा जाता था लेकिन आजकल तो बोझ लगने लगे हैं अतिथि आदि आदि.

कुछ हद तक इन बातों में सच्चाई भी है किन्तु जब हम इस तरह के बदलाव के मूल में झांक कर देखते हैं तो पाते हैं कि इसमें दोष किसी व्यक्ति विशेष का न होकर आज की जीवन शैली, शिक्षा – दीक्षा , एकल तथा छोटे परिवारों का होना, घरों के नक्शे तथा पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण तो है ही ऊपर से बचा खुचा समय सोशल मीडिया में खर्च हो जाते हैं लोगों के !
एकल परिवारों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मनोनुकूल जीवनशैली तो रहती है जहाँ किसी अन्य का रोक – टोक नहीं होता इसीलिये इसका चलन बढ़ भी रहा है ! किन्तु एकल परिवारों तथा आज की जीवनशैली में मेहमानवाजी के लिए समय निकालना जरा कठिन है!
संयुक्त परिवार में हर घर में बूढ़े बुजुर्ग रहते थे जिनके पास काम नहीं होता था या कर नहीं सकते थे तो जो भी आगन्तुक आते थे बूढ़े बुजुर्ग बहुत खुश हो जाया करते थे क्योंकि कुछ समय या दिन उनके साथ बातें करने में अच्छा गुजर जाता था तथा मेहमान भी मेहमानवाजी और अपनापन से प्रसन्न हो जाते थे!
इसके अलावा बच्चे भी मेहमानों को देखकर उछल पड़ते थे क्योंकि एक तो मेहमान कुछ न कुछ मिठाइयाँ आदि लेकर आते थे इसके अलावा घर में भी तरह-तरह का व्यंजन बनता था जिसका बच्चे लुत्फ उठाते थे!
तब घर की बहुओं को चूल्हा चौका से ही मतलब रहता था बहुत हुआ तो थोड़ा बहुत आकर मेहमानों को प्रणाम पाती करके हालचाल ले लिया करतीं थीं और बड़ों के आदेश पर खाने पीने आदि की व्यवस्था करतीं थीं! मतलब संयुक्त परिवार में हर आयु वर्ग के सदस्यों में काम बटे हुए होते थे जिससे मेहमान कभी बोझ नहीं लगते थे बल्कि उनके आने से घर में और खुशियों का माहौल रहता था !
किन्तु एकल परिवारों में बात से लेकर खाने – पीने रहने – सोने तक सब कुछ का इन्तजाम घर की अकेली स्त्री को ही करना पड़ता है क्योंकि पुरुष को तो आॅफिस टूर आदि से फुर्सत ही नहीं मिलती और घर में जब स्मार्ट और सूघड़ बीवी हो तो पति तोऊनिश्चिंत हो ही जाते हैं ! बच्चों पर भी पढ़ाई का बोझ इतना रहता है कि उनके पास मेहमानवाजी करने का फुर्सत नहीं रहता! यदि वे मेहमानों के साथ बैठना चाहें भी तो मम्मी पापा का आदेश होता है कि जाओ तुम फालतू बातों में मत पड़ो अपनी पढ़ाई करो! ऐसे में मेहमानों के आगमन पर काम के साथ-साथ बात चीत आदि का कार्य भी स्त्रियों पर ही आ जाता है जिसके कारण उनके पास अपने लिये ज़रा भी समय नहीं बच पाता है ऐसे में खीजना स्वाभाविक भी है!
मिसेज ओझा बहुत कुशल गृहिणी हैं उनके यहाँ जो भी आता है खूब खुश होकर जाता है लेकिन वो मेहमानों के जाने पर चैन की सांस लेती हैं और फिर मेहमानों के आगमन को सुनकर पहले ही घबरा जाती हैं भले ही अपने व्यवहार और बातों से जाहिर नहीं होने देती हैं!
इसमें यदि इमानदारी से देखा जाये तो उनका कोई दोष भी नहीं है क्योंकि दो रूम के फ्लैट में अपने चार – चार बच्चे पढ़ने वाले उसमें हमेशा चार छः मेहमानों का आना – जाना… बेचारी का दिन रात किचेन में ही गुजरता था वो तो फिर भी बर्दाश्त कर लेती थीं लेकिन दिन रात मेहमानों के शोर से बच्चों का पढ़ाई प्रभावित होता तो वे परेशान हो जातीं थीं लेकिन कुछ कर नहीं पाती थीं!
जहाँ घरेलू स्त्री है वहाँ तो फिर भी ठीक है किन्तु जहाँ पर पति पत्नी दोनों ही कार्यरत हैं वहाँ की समस्या तो और भी जटिल है! उन दम्पत्तियों के पास तो मेहमानों के लिए बिल्कुल भी समय नहीं होता क्योंकि उनका रुटीन भी कुछ अलग होता है ! कभी नाइट शिफ्ट तो कभी डे शिफ्ट… ऐसे में उनके पास सिर्फ वीकएंड ही बचता है जिसमें उन्हें आराम भी करना होता है और घूमना – फिरने का समय निर्धारित ही रहता है ऐसे में उनके पास अचानक कोई मेहमान टपक पड़े तो फिर दिक्कत तो होगी ही!
तान्या और मनोज दोनों मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत थे! हफ्ते भर काम करने के पश्चात वीकेंड का इंतजार करते थे ताकि नींद पूरी हो सके! वीकेंड पर उनका दोस्तों के साथ आउटिंग का प्रोग्राम था जाने की पूरी तैयारी हो गयी थी तभी कोई दूर के रिश्तेदार के आगमन की सूचना मिली तो प्रोग्राम रद्द करना पड़ा…. इसमें तान्या मनोज का प्रोग्राम तो रद्द हुआ ही साथ ही उनके दोस्तों का भी रद्द हो गया जिससे तान्या और मनोज का मन खिन्न थे!
बात मित्रों की हो या रिश्तेदारों की जाना वहीं चाहिए जहाँ पर आत्मीयता हो और आपके जाने से आपके मित्र या रिश्तेदार को खुशी मिले!
इस विषय में महाकवि तुलसी दास जी ने भी अपने दोहे के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है…

आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहाँ न जाइये, कंचन बरसे मेह।।

यदि मित्रों या रिश्तेदारों के पास जाना हो तो जाने से पहले सूचित अवश्य कर दें ताकि आपका मित्र या रिश्तेदार आपके लिए समय निकाल सके!
जाने के बाद मेजबान के कार्य में यथासम्भव मदद अवश्य करें!
अपना सामान यथास्थान ही रखें ! बच्चे साथ हों तो उनपर ध्यान दें! घर का सामान यदि बिखर गया हो तो धीरे से ठीक कर दें!
मिसेज मल्लिक अपना घर महंगे – महंगे शो पिसेज से खूब सजाधजाकर रखतीं हैं लेकिन उनके एक रिश्तेदार हैं जिनके बच्चे आकर घर में भूकंप मचा देते हैं लेकिन वो रिश्तेदार दम्पति न तो अपने को देखते हैं न टोकते हैं बल्कि और हँसते हैं! उनके जाने के बाद कितने ही शो पिस टूट गये होते हैं… मिसेज मल्लिक कुढ़ कर रह जाती हैं और उनके जाने के बाद राहत की साँस लेती हैं!
सबसे जरूरी कि जो भी व्यंजन खाने पीने के लिए परोसे जायें उसका तारीफ अवश्य कर दें तो बनाने वालों को खुशी मिलती है साथ ही यथासंभव मेजबान का हाथ बटायें ताकि मेजबान आपका पुनः प्रतीक्षा करे!
मिस्टर सिंह सपरिवार अपने दोस्त के यहाँ हफ्ते भर के लिए आये उनके दोस्त और दोस्त की पत्नी बहुत खुश हुईं! उनके लिए तरह-तरह के डिसेज बनाती और खिलाती मिस्टर सिंह और उनकी पत्नी खूब तारीफ़ करते और डिमांड कर कर के डिसेज बनवाते! मिसेज सिंह काम के वक्त मैग्जीन आदि में उलझी रहतीं थी और जब काम खत्म हो जाता तो बातें करने लगतीं थी ऐसे में उनके दोस्त की पत्नी को आराम ही नहीं मिलता था और चार पाँच दिन में बीमार पड़ गईं! कितना अच्छा होता कि मिसेज सिंह मेजबान के काम में थोड़ा हाथ बटातीं तो ये खुशियाँ दूनी हो जाती!

माना कि समय कीमती है लेकिन अपने समय में से थोड़ा समय चुराकर यदि मेहमानों के लिए निकाली जाये तो रिश्तों की गर्माहट बनी रहेगी, जिंदगी में कभी अकेलापन महसूस नहीं होगा तथा खुशियों में गुणोत्तर बढ़ोत्तरी होगी!

3 विचार “अतिथि तुम कब………&rdquo पर;

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