मर – मर कर ही जिंदगी ने

मर – मर कर ही जिंदगी ने,
मरकर जीना सीख लिया |
लगा पाँव को ठोकर तब से ,
स्वयं सम्हला सीख लिया ||

मॄगतृष्णा में भटक-भटक कर ,
भाग रहे हैं लोग यहाँ |
सोच रहा है चातक पंक्षी ,
बूंद स्वाति की मिले कहाँ ||

छलकर विजयी झूठ हो रहा ,
टूट रहा सच का दर्पण |
लोग मुखौटा लिए लगाए ,
बदल रहे देखो क्षण – क्षण ||

जड़ें जमाकर भ्रष्टाचार ,
लो अब तो आचार बनी |
इसीलिये तो आज हमारी,
भारत माँ लाचार बनी |

किस – किस को कोसोगे बोलो,
क्या कहोगे चोरों को |
जब लोग प्रलोभन स्वयं दे रहे ,
लोभी रिश्वतखोरों को ||

सीधेसादे लोगों ने भी ,
छलप्रपंच अब सीख लिया |
लगा पाँव को ठोकर तब से ,
स्वयं सम्हाला सीख लिया ||

2 विचार “मर – मर कर ही जिंदगी ने&rdquo पर;

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