प्रीत की पाती की समीक्षा

हर कविता की अपनी एक विशिष्ट धरा तथा एक कहानी होती है जिस पर भावनाओ का अकुरन होता है। कल्पनाओं के अजब गजब उपवन में रस छंद अलंकारों की कितनी ही शाखें और कितने पत्ते बना देता है मन । मरुस्थल में भी जल की बूंदों की बौछारें गिरा जाती हैं कविताएं।
ऐसा ही कुछ आदरणीया सखी किरण सिंह जी का नवीनतम काव्य संग्रह #प्रीतकीपाती पढ़ते समय प्रतीत हुआ ।
जो मुझे कुछ समय पूर्व उनके द्वारा उपहार स्वरूप मिला ।

सम्बन्ध एक धरा पर जन्म लेने को कदापि मोहताज नही होते स्नेह और सम्मान की एक अदृश्य डोर होती है जिसमे कब दो मन आपस मे गुथ जाते हैं पता ही नही चलता ।आभासी दुनिया की ऐसी एक संवेदनशील हृदय की स्वामिनी तथा रचनाकारा से मन के तार जुड़ना मैं मेरा सौभाग्य समझती हूँ ।

आपके द्वारा रचित प्रीत की पाती की सभी रचनाएँ मूलतः मुझे श्रृंगार रस में भीजी सीझी दिखी ।पृष्ठ दर पृष्ठ ये रचनाएँ पढ़ते हुए मन मे एक ऐसी भारतीय स्त्री की छवि उभर कर सामने आई ।जिसका प्रियतम ही उसका सम्पूर्ण संसार है, उसके बनाये रंगमंच की वह प्रधान नायिका है जो पवित्र विवाहबन्धन में बंधने से लेकर गुजरे अनेकों कालखण्डों पर अपने मन की यात्रा का वृत्तान्त अपने शब्दों को साज श्रृंगार उढ़ाते हुए सजीव करती उसके साथ साथ आगे को बढ़ रही है।

अपने प्रियतम के साथ अखंड प्रीत बंधन में बंधने से पूर्व की मनोदशा से गुजरने से लेकर गृहस्थ जीवन की तमाम उठापटक के मध्य में नायिका मांग के सिंदूर की सुगन्धि से मन के आकाश में उषा और संध्या रच रही है ।अपने कर्मठ हाथों से दिनमानों को व्यवस्थित कर रही है। जिसके भविष्य संवारते पग थाप पर उसकी अदृश्य उपस्थिति प्रदर्शित करते घुंघरुओं की आवाज़ समय की धरा पर अपने स्वर बदल बदल कर अपने प्रियतम के नगर का कोण कोण झंकृत करते हुए वातावरण को सुरम्य तथा संगीतमय बनाये हुए है।

प्रिय के विचारों के इर्द गिर्द घूमती कथ्य अकथ्य से भरी इन ढेरों पातियों को आपने अपने पतिदेव को समर्पित कर इस संग्रह को वस्तुतः श्रेष्ठतम पाठक दिया है । इसके लिए आप विशेष बधाई की पात्रा है। क्योंकि शायद एक गृहस्थ स्त्री सदा यह चाहती है कि उसका प्रिय हृदय की मूल जड़ों को काल की धरा पर कब और कैसे किन भावों से अभिसिंचित करना है यह भी समझ सके तथा यह सफर आसान बनाने में उसका सहयोगी सिद्ध हो। जैसा कि वह अनकहे बहुत कुछ समझ उसके नगर में प्रवेश करने के उपरांत एक एक रिश्तों को आत्मसात करते हुए निरन्तर रहती है।

आपकी अपनी बात से गुजरते हुए कितनी ही बार मेरा मन विह्वल हो आया अश्रु कण्ठ पर आ अटके अमूमन यह हमारे देश की हर ब्याहता स्त्री के मन की करुण कथा है बाबुल के घर लाड़ो पली बिटिया जब अचानक रीतियों के मदारी के चंगुल में अचाहे जा फंसती है यह परिवर्तन उसके लिए सहज नही होता किन्तु संस्कृति और संस्कारों की जन्मभूमि में पोषित होने के कारण उसे इस परिवर्तन को सहज स्वीकारना पड़ता है।
चूंकि वह एक स्त्री है ,उसका हृदय नम है उसकी प्रवृत्ति व प्रकृति सृजनशील है।वह जल सी तरल है और सरल भी सो जीवन के बढ़ते क्रम के साथ साथ हर परिवर्तन को सहज स्वीकार करती चलती है जिस भी घट डालो उसी का रूप ले लेती है ।

कर्तव्य है सृजन हमारा
करूँगी मैं हंसते हँसते
बाबा मोहे दान मत दीजिए……

बड़े ही सहज शब्दों में आपने पूर्ण स्त्री बनने से पूर्व एक सुकुमारी के मन की हलचल भरी कितनी ही बातें इस अभिव्यक्ति में कह डाली जो एक कन्या सोचती तो है परंतु सांसारिक नियमों के बंधनों तहत बंधे अपने माता पिता से विरले ही वह कह पाती है।

ज्यों ज्यों मैं इस पुस्तक को पढ़ते आगे को बढ़ती जा रही हूँ ।पन्ने दर पन्ने जीवन के आयाम बदल रहे हैं । मन बदलने लगा है वह अब बहल भी रहा है। अभिव्यक्तियाँ निजता भूल प्रेम रस में नख शिख तक डूबने लगी हैं । कहीं रूठना मनाना, कहीं जुझारूपन, कहीं भावों का भक्तिमय हो जाना, कहीं गुदगुदाती छेड़छाड़ भाव विविधा के साथ छंदमुक्त छंदबद्ध गीत दोहावली सवैया मुक्तक घनाक्षरी जैसी साहित्यिक विधाओं से जोड़ते हुए आपने रचनाधर्म का बखूबी पालन व रचनाओं को पोषित किया है।

इस संग्रह में आपकी कुल 53 छंदबद्ध रचनाएँ हैं मूलाधार भाव प्रेमासक्ति प्रिय के प्रति सम्पूर्ण समर्पण दिखा । जपमालिका के 108 मनकों की भांति प्रीति के मंत्र जपते आपके लिखे ये मुक्तक पढ़े जिनसे किसी पाठक को आपके धार्मिक होने का भान होगा। 8 सवैया 22 प्रीति के रसायन में घुले दोहे पढ़ने को मिले जिनमे मूल भाव प्रिय के प्रति अगाध प्रीति ही है तथा अमूमन सभी रचनाएँ रस श्रृंगार को स्वयं में समेटे हुए हैं सो इसे प्रीत की पाती नाम देना बेहद सार्थक है।

विवाहोपरांत एक स्त्री के बदले धरातल ,नई मिट्टी में पुनः स्वयं को स्थापित करते, भीतर नवजीवन भर अपने जीवन संगी के साथ चलते एक कल्पित संसार का यथासम्भव सृजन करती इस सुंदर मन यात्रा पर आपने आपकी भावनाओं को समय की धरा पर अत्यंत सुंदर शब्द रश्मियों से सजाया है। आपको इस संग्रह की सफलता हेतु अनेकों बधाइयाँ तथा शुभकामनाएं। आशा करती हूँ निकट भविष्य में पुनः आपकी रचनाएँ संग्रह के रूप में पढ़ने को मिलेंगी ।
साभार

प्रियंवदा अवस्थी

प्रीत की पाती की समीक्षा&rdquo पर एक विचार;

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