निरुत्तर

जैसे ही गाँव से चाचा का निमंत्रण कार्ड आया मैं तो उछल पड़ी…. मन ही मन स्वप्न बूनने लगी कि चलो अब मैं उन सभी गांव की पुरानी सहेलियों से मिलूंगी जिनके साथ बचपन में गुड़िया गुड्डे, कित – कित, गोटी तथा लुकाछिपी आदि खेला करती थी! मन ही मन सोच रही थी मैं कि कितने बदल गए होंगे सब लोग! शादी के बाद कहां जा पाती थी मैं गांव में ! पापा शहर में रहते थे ! जाने का मन तो बहुत होता था लेकिन दो चार दिन के लिए ही जाना हो पाता था उसमें ही मायके और ससुराल मैनेज करना पड़ता था! किसी – किसी तरह से सहेलियों से मिल पाती थी..!

फिर शुरू हो गई शादी में जाने की तैयारियां और वही स्त्री सुलभ कश्मकश कि कौन से रंग की साड़ी पहनू, उसपर कौन सी चूड़ियाँ चूड़ियाँ, किस तरह की चोटी और किस कलर का लिपस्टिक, और अचानक लिपस्टिक से मेरे होठ स्वतः ही मुस्कुरा उठे , याद आ गयी एक पुरानी बात जब मैं गाँव गई थी और अपने होठों पर काॅफी कलर की लिपस्टिक लगाई थी….. तब मेरी चाची बड़े प्रेम से मेरे बगल में बैठते हुए कुछ चिंतित होते हुए पूछी थीं… रीना तोहार ओठवा करिया कइसे हो गइल बा…? ( रीना तुम्हारा ओठ काला कैसे हो गया है..? ) मैं कुछ अचंभित होते हुए बोली क्या..?
फिर जब बात समझ में आई तो अपनी हँसी रोकते हुए बोली थी चाची मेरा होठ काला नहीं हुआ है .. ये लिपस्टिक का रंग आजकल के फैशन में है , फिर चाची ने कहा था कि रीना बाकिर इ तोहार लिपिस्टिक के रंग शोभत नइखे! इ बताव कि लिपिस्टिक लगा के करीया ओठ के लाल कइल जाला कि लाल ओठ के करिया कइल जाला.. ( ये तुम्हारा लिपस्टिक का रंग सुन्दर नहीं लग रहा है, ये बताओ लिपस्टिक लगाकर काले ओठ को लाल किया जाता है या लाल होठ को काला..? )
उसके बाद फिर मेरी साड़ी को छूकर बोली थीं इ का एही उमर में उदास रंग के साड़ी पहिर ली..? सुहागिन के त असहूं लाल पीला पहिरे के चाहीं !
इसलिए मैं इस बार शादी में खूब चटक रंग की साड़ी , लाल लिपस्टिक , लाल हरी मैचिंग चूड़ियाँ पैक कर ली और फिर विवाह में जाने के लिए दिन गिनने लगी.! सच में प्रतीक्षा की घड़ियाँ बहुत लम्बी होती हैं दिन जल्दी आ ही नहीं रहा था!
आखिर समाप्त हुई प्रतीक्षा की घड़ी और मैं पहुंची गाँव..! गाँव पहुंचते ही इतना स्वागत सत्कार हुआ कि कुछ देर के लिए तो मैं खुद को राजकुमारी सी महसूस करने लगी थी…!
फिर चाची मेरा नज़र उतारते हुए सबको सुनाते हुए कहने लगीं देखो तो एक इ बिटिया है एतना दिन बड़े शहर में रहे के बादो बदली नहीं , अउर इहाँ देखो इ सबको दू दिन शहर का गईं लगीं चिरइया कट बार कटा-कटा के लगतीं हैं अंग्रेजी छांटे.!
सबसे बातें करते करते कब शाम हो गई पता ही नहीं चला और शुरू हो गया गाना बजाना ढोलकी के थाप पर…… बन्नी अपनी सुहाग मांगे डिबिए में………!
तभी मेरी नज़र मीना भाभी पर पड़ी जो कि फीके और उदास रंग की साड़ी पहनी थीं लेकिन अपने नृत्य और गीत से पूरे माहौल को रंगीन कर रही थीं.!
अभी पिछले वर्ष ही तो भैया उन्हें श्वेत वस्त्रों का उपहार देकर सदा के लिए चले गए थे अपने इस सुंदर संसार को छोड़कर…!
बेचारी मीना भाभी को कितना प्रेम था रंगों से… भर भर मांग सिंदूर, भर – भर हाथ सुन्दर सुन्दर रंग बिरंगी चूड़ियाँ, माथे पर बड़ी सी बिंदी… उफ सब छीन ली गई थी मीना भाभी से! नीयति ने तो उनके साथ क्रूर खेल खेला ही था लेकिन अपने परिजन भी क्रूरता कर ही देते हैं इन कुरीतियों और कुप्रथाओं के चक्कर में पड़कर छीन लिए थे मीना भाभी के सोलह श्रृंगार !
मीना भाभी अपने होठों पर मुस्कान बिखेरते हुए मुझे भी खींच ले गईं नाचने के लिए और हम सब मिलकर खूब नाची गाईं…!
इधर कुछ रिश्तेदारी की औरतें आपस में खुसुर फुसुर कर रहीं थीं जिसका आशय समझने में मुझे देर नहीं लगा ! भला एक विधवा के चेहरे पर खुशी की एक झलक बर्दाश्त कैसे कर सकता है ये क्रूर समाज , सच औरत ही औरत की दुश्मन होतीं हैं!
मीना भाभी इन सब बातों से बेखबर नाच गाने के बीच में उठ उठ कर अपना काम भी निपटा आती थी और फिर आकर ढोलकी के थाप के साथ वातावरण में अपना मधुर संगीत घोल देतीं थीं !
दूसरे दिन हल्दी मटकोड़ का रस्म था मीना भाभी पूरी तैयारी कर रही थीं ! उसके बाद कोहबर लिखना था जिसमें दिवार पर दूल्हा दुल्हन का नाम लिखकर फूल पत्तियों आदि से चित्रांकन किया जाता है, इस कला में तो मीना भाभी ही पारंगत थीं ! जबसे इस घर में बहू बनकर आईं सबका कोहबर वही लिखती थीं ! मीना भाभी सुबह से ही लिखने के रंगों का मिश्रण तैयार कर रही थी ! मुझे कई तरह के डिजाइन दिखाकर पूछ रही थी कि कौन सा कोहबर बनाऊँ और मैंने अपनी पसंद बता भी दिया था !
जैसे ही भाभी कोहबर लिखने के लिए जाने लगीं तो चाची का उनको धीरे से सकपकाती हुई ही टोकीं…रुको दुल्हिन हल्दी और कोहबर की रस्में सिर्फ सुहागिने ही करती हैं !
उसके बाद तो मीना भाभी के हांथों से हल्दी और रंगों के थाल छूट गया , आँखों से आँसू तटबंध तोड़ कर बहनों लगे, मीना भाभी अपने कमरे में चली गई ताकि उनके आँसुओं को कोई देख न पाये !
इधर शुभ मुहूर्त निकल न जाए इसलिए सभी लोग हल्दी कोहबर आदि रस्मों में व्यस्त हो गए , पर मेरा मन उन रस्मों में नहीं लगा और मैं मीना भाभी के रूम में चली गई ! कुछ देर तक तो वे कुछ नहीं बोलीं, सिर्फ उनके आँसू ही उनकी दर्द भरी दास्तां सुना रहे थे!
जब मैं ज्यादा मान मनुहार करने लगी तो बोलीं आप ही बताइये बीबी जी अम्मा जी के बेटे भी तो गये हैं फिर उनके शरीर पर उनका भूत सवार नहीं है और मुझपर उनका भूत सवार हो गया है!
और मैं निरुत्तर हो गई !

6 विचार “निरुत्तर&rdquo पर;

  1. Mamta kashyap

    सच मे हम औरत ही औरत के दुश्मन है…कई बार ऐसी स्थिति देखती हूँ कि एक औरत विधवा हो गई अगर उसमे आत्मविश्वास भी दिख जाए तो लोग को बुरा लगता और सोचती की पति के देहांत केबाद भी ….

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  2. ये सब देखकर ह्रदय द्रवित हो जाता है , एक स्त्री अपने जीवनसाथी को खो कर वैसे ही किसी तरह जीने की कोशिश कर रही होती है , पर समाज उसके इस प्रयास में साथ देने के स्थान पर उसे और तकलीफ देने की कोशिश में लगा रहता है | उससे भी ज्यादा दुखद है कि इसमें औरतें ज्यादा शामिल हैं

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