भोला और चन्दन

कुछ अपरिचित लोगों से भी अपनापन महसूस होने लगता है तथा मन में अनायास ही उनके लिए सम्मान का भाव उत्पन्न हो जाता है और हम खुद भी नहीं समझ पाते हैं कि ऐसा क्यों? कुछ ऐसी ही व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं आदरणीया आशा सिंह जी !
जैसे ही उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक भोला और चंदन { लघु उपन्यास} भेंट स्वरूप मुझे प्राप्त हुई मैं उसे लेकर पढ़ने बैठ गई ! और पढ़ने के पश्चात मुझे जो अनुभूति हुई उसे आप सभी से साझा किये बिना रहा नहीं गया !

पुस्तक के कवर पृष्ठ पर ही एक हाथी और किशोर के चित्र से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस पुस्तक में अवश्य ही हाथी और किशोर के रिश्तों को ध्यान में रखते हुए कहानी की पृष्ठभूमि तैयार की गई होगी! पुस्तक की छपाई स्पष्ट अक्षरों में की गई है जिसे पाठक सहज ही पढ़ सकते हैं !
हाँ यह कहानी भोला ( बाल हाथी ) और चंदन एक किशोर ( पिलवान का बेटा मतलब हाथी की देखरेख करने वाले का बेटा ) की है ! यहाँ लेखिका ने भोला और चंदन की मित्रता और पारस्परिक संवेदनशीलता का जिक्र करते हुए अपनी जानवरों की भाषा की समझ और उनके प्रति प्रेम भाव का भी परिचय दिया है जिससे लेखिका के सहज और कोमल हृदय का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है !
पुस्तक में शब्द संयोजन सरल है जिसे आसानी से पढ़ा व समझा जा सकता है ! कहीं कहीं पर गंवई मुहावरे कहानी की रोचकता बढ़ाते हुए शिक्षा भी दे जाते हैं !
इस कहानी में ग्रामीण जीवन शैली तथा उनकी मानसिकता का रोचकता पूर्वक वर्णन किया गया है जैसे ( जैसे सुल्तानपुर दबंग लोगों का गांव है पता नहीं माटी का असर है कि पास वाली बहती नदी का कि लोग काफी लम्बे चौड़े एवम् बलिष्ठ हैं ! लड़ाकू भी अच्छे हैं जिन लोगों को अपने गांव में दबंगई दिखाना होता था वे ही अपनी बिटिया का सम्बन्ध सुल्तानपुर के लड़कों से करते ! और फिर गांव की दवंगई की परिचर्चा भी बड़े ही गुमान से की गई है.! यहाँ पुलिस नहीं आई तो चोर डाकू भी नहीं आते ! चोर डाकुओं में तो कहावत मशहूर है कि गलती से भी सुल्तानपुर की तरफ मत देखना वर्ना दिन का सूरज दिखा देंगे ! लाठी से तो मारते ही हैं ढेला मार मार कर दौड़ा लेते हैं ! ढेला मारने में तो गांव का बच्चा बच्चा एक्सपर्ट है इसलिये गांव को ढेलहवा गांव भी कहा जाता है ) इस तरह के कितने ही गंवई माहौल में पाठक भ्रमण करता है ! कहानी में गांव के ठाकुरों से लेकर नाई, पिलवान , ओझा, तथा चोर डाकुओं तक की चर्चा की गई है !
इस पुस्तक का सबसे अच्छा भाग मुझे यह लगा कि यह कहानी हमारी पुरानी जमींदारी व्यवस्था को सजीवता से दर्शाती है जिसे पढ़ते हुए मुझे भी अपना बचपन स्मरण हो आया और मैं कुछ देर के लिए स्मृतियों में खो गई ! याद आने लगा मुझे भी अपने पुरखों की हवेली जिसके छज्जे पर पत्थरों से निर्मित सिंह दहाड़ रहे थे अब वे बाढ़ की भेंट चढ़ कर गंगा में विसर्जित हो गई !
इस कहानी में ठाकुरों के मूछों की भी चर्चा जबरदस्त तरीके से की गई है जिसे बढ़ाने तथा बचाने के लिये ठाकुरों को कितनी मशक्कत करनी पड़ती थी !
हाथी के दांत दिखाने के लिए और तथा खाने के कुछ और ही होते हैं ठाकुरों के हृदय को भी कुछ ऐसा ही दर्शाया है लेखिका ने जो कोमल तो है किन्तु कठोर दिखाते थे बिलकुल नारियल की तरह जिसका ऊपरी हिस्सा कठोर तथा अन्दर पौष्टिक तरलता लिए हुये होता है ! तभी तो कहानी के अंत में चंदन के द्वारा ठाकुर गजेंद्र सिंह के आदेश का उल्लंघन कर भोला ( हाथी ) को ठाकुर के द्वारा चलाई जाने वाली गोली से बचाने के लिए जब चंदन भोला के आगे खड़ा हो जाता है गोली खाने के लिए तो ठाकुर भी चंदन को शाबाशी देते हैं !
कहीं कहीं पर लेखिका ने मनुष्य के स्वाभाविक मनोभावनाओं को भी उजागर किया है जैसे _तेरा मेरा ने सभी को लपेटे में ले रखा है सच ही कहा जाता है कि आदमी इसलिये नहीं दुखी है कि उसे दुख है बल्कि इसलिए दुखी है कि दूसरे खुश हैं !
कुल मिलाकर यह रोचकता एवं कौतूहल से भरपूर एक शिक्षाप्रद, पठनीय एवं संग्रहणीय कहानी है जिसे हम सभी को अवश्य पढ़ना चाहिए! पुस्तक की गुणवत्ता को देखते हुए मूल्य भी कोई खास नहीं है सिर्फ 195 रुपये में इस पुस्तक को प्राप्त किया जा सकता है !
किरण सिंह

3 विचार “भोला और चन्दन&rdquo पर;

  1. किरण सिंह से प्रेरणा लेकर मैंने पुस्तक कुछ लोगों को भेज दी । किरण जी ने पूरा पढ़ा,और समीक्षा लिखी । यह समीक्षा हृदय से लिखी गई है, क्योंकि उपन्यास के मानवीय संवेदनाओं को भलीभांति पकड़ लिया । यही लेखक का सबसे बड़ा पुरुस्कार है, जो किरण ने मुझे दिया ।मैं अत्यंत आभारी हूँ ।

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