इज्जत

व्हाटस्ऐप पर नीलम का मैरिज कार्ड मैसेज पर स्नेहा और अंकित का नाम देखकर तो कुछ पल के लिए विश्वास ही नहीं हो रहा था “लग रहा था कि कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही हूँ न? खुशी तो वैसे भी बहुत हो रही थी लेकिन और भी अधिक इसलिए कि मेरा समझाना सार्थक हो गया ! फिर मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते हुए याद करने लगी….

अभी पिछले ही वर्ष की तो बात है जब नीलम के घर का डोरवेल बजाते हुए मैं मन ही मन सोंच रही थी कि अचानक इतने दिनों बाद नीलम मुझे देखकर तो खुशी से उछल पड़ेगी..लेकिन दरवाजा आया खोली… घर में कुछ सन्नाटा सा पसरा हुआ था , मुझे लगा शायद नीलम घर में नहीं है इसलिए अपने सरप्राइज देने वाले आइडिया पर खुद ही गुस्सा भी आ रहा था., सोच रही थी कि गलती तो मेरी ही है ! ये क्या बच्चों की तरह मैं भी उटपटांग आइडिया का एक्सपेरिमेंट करती रहती हूँ.. भला आजकल की भागदौड़ वाली व्यस्त जीवन शैली में भी कोई बिना बताये कहीं जाता है क्या …?
तभी अपने बेडरूम से नीलम को आते हुए देख कर मेरे दिल को तसल्ली मिली और होठ अनायास ही मुस्कुरा उठे, लेकिन नीलम को मुस्कुराने के लिए काफी प्रयत्न करना पड़ रहा था यह मेरा मनोवैज्ञानिक मन समझ रहा था…लेकिन सहज ही विश्वास भी नहीं कर पा रहा था अपनी समझ पर “क्योंकि कभी-कभी तो आँखों देखी भी गलत हो जाती हैं और चेहरे के भावों का क्या वो तो गिरगिट की तरह रंग बदलते ही रहते हैं!
अरे मैं आई हूँ और तू इतनी उदास मेरे आने से खुशी नहीं हुई न तुझे..? मैनें नीलम को थोड़ा उकसाने के कहा ..!
नीलम” अरे नहीं यार तू ऐसा सोच भी कैसे सकती है…?
मैनें कहा हमेशा कहती रहती थी न कि स्नेहा के विवाह के लिए कोई अच्छा लड़का बताना तो मैंने तेरा वह काम कर दिया ” अरे – अरे तेरा क्यों “स्नेहा तो मेरी भी बेटी है..!
अभी आती हू” मेरी बात को को बीच में ही छोड़कर नीलम किचेन में चली गई!

आँटी ( नीलम की सास) मेरे समीप आकर बैठते हुए , जैसे वह नीलम के हटने की प्रतीक्षा ही कर रही थी……धीरे आवाज़ में बल्कि फुसफुसाते हुए ही मुझसे कहने लगीं.. बहुते मन बढ़ गया है आजकल के बचवन का….. एक से बढ़कर एक रिश्ता देखे रहे नंदकिशोर ( उनका बेटा नीलम के पति ) बाकीर स्नेहा बियाह करे खातिर तैयारे नाहीं है…! मैंने कहा पूछ लीजिए न नेहा से आजकल के बच्चे हैं, कहीं किसी और को तो नहीं पसंद करती है …?
वैसे तो मैंने कहीं किसी और से तो प्यार नहीं करती है ? कहना चाहा लेकिन कुछ शिष्टता के साथ ही मैंने पसंद की बात कही ..! मेरे इतना कहने पर तो आंटी मुझपर ही बरस पड़ीं, कहने लगीं तुम भी कइसन बात करने लगी किरण……. अरे हमन लोग ऊँची जाति के हैं कइसे अपने से नीच जाति में अपन घर की इज्जत ( बेटी ) दे दें.. अउर नीच जाति का स्वागत सत्कार हम ऊँची जाति वाले अपन दरवाजे पर… छीः.. यह सब हम नाहीं करे सकत हैं…! अरे एतना इज्जत कमाया है हमर लड़का नन्दकिशोर “सब मिट्टी मा मिल जाई…! एही खातिर पहिले लोग बेटी का जनम लेते ही मार देत रहा सब….अब ओकरे पसंद के नीच जाति मैं बियाह करब तो खानदान पर कलंके न लगी…इ कइसन बेटी जनम ले ली हमर नन्द किशोर का…..!
मैं आंटी की बातें बिना किसी तर्क किए चुपचाप सत्यनारायण भगवान् की कथा की तरह सुन रही थी..और आँटी की पिछली बातें याद आ गई …जब आंटी नेहा की प्रशंसा करते नहीं थक रही थी… कह रहीं थीं एकरा कहते हैं परवरिश….. आज तक नेहा पढाई में टॉप करत रह गई…पहिले बार में नौकरियो बढिया कम्पनी में हो गवा…..अउर एतना मोटा रकम पावे वाली बेटी को देखो तो तनियो घमंड ना है उका……………..घर का भी सब काम कर लेत है…. अउर खाना के तो पूछ मत…. किसिम किसीम के (तरह तरह का) खाना बनावे जानत है…… आदि आदि…………….. भगवान् केकरो ( किसी को भी ) बेटी दें तो नेहा जइसन…. और तब मैं आंटी के हां में हां मिलाते जाती थी….. तभी नीलम नास्ते का ट्रे लेकर आ गई और मैं स्मृतियों से वापस वर्तमान में लौट आई…!
आंटी की बातों से नेहा की उदासी का पूरा माजरा समझ चुकी थी मैं फिर भी मैं नीलम के मुह से सुनना चाहती थी इसलिए नीलम से पूछा आखिर बात क्या है नीलम……………… और स्नेहा किसे पसंद की है….. लड़का क्या करता है आदि आदि……….
नीलम की आँखें छलछला आईं…लेकिन आँसुओं को पलकों में ही में समेटते हुए बोली…. लड़का का नाम अंकित है, वह आईआईएम से मैनेजमेंट करके जाॅब कर रहा है पचास लाख का पैकेज है देखने में भी बहुत हैंडसम है.! बाप की बहुत बड़ी फैक्ट्री है….!
मैंने कहा तो अब क्या चाहिए… इतना अच्छा लड़का तो दीया लेकर ढूढने से भी नहीं मिलेगा , कर क्यों नहीं देती उसी लड़के के साथ स्नेहा की शादी…?
वैसे तो मैं सब समझ ही रही थी फिर भी नीलम के मुंह से ही सुनना चाह रही थी .!
नीलम बोले जा रही थी क्या कहूँ , अब तुमसे क्या छुपाना है… लड़का बहुत छोटी जाति का है उसपर भी इसी शहर का…. इसका चचेरा भाई तो मेरा ड्राइवर रह चुका है… अब बोलो कैसे मन को मनायें हम ” और मान लो किसी भी तरह से अपने मन को मना भी लेते हैं हम तो लोग क्या कहेंगे, इस छोटे शहर में तो रहना मुश्किल हो जाएगा हमारा …!
मैंने कहा लोगों की छोड़ो पहले तुम क्या सोंचती हो ये बताओ…?
नीलम – मेरे चाहने न चाहने से क्या होगा…. मेरे पति इस रिश्ते के लिए कतई तैयार नहीं हैं… और मैं अपने पति के खिलाफ नहीं जा सकती ….नीलम बोले जा रही थी “इन बच्चों के लिए क्या – क्या नहीं किया हमने और ये बच्चे सच में आज की जेनरेशन बहुत स्वार्थी है ….
मैंने बीच में रोकते हुए नीलम से पूछा…. इस विषय में तुम स्नेहा से खुद बात की..? नीलम ने कहा हाँ एक दिन मेरे पति ने बहुत परेशान होकर कहा कि पूछो स्नेहा से कि वो सोसाइट करेगी या मैं कर लूँ….! मेरी तो जान ही निकल गई थी मैंने स्नेहा को समझाने की भरपूर कोशिश की… पर उसका एक ही उत्तर था कि मैं यदि अंकित से शादी नहीं करूंगी तो किसी और से भी नहीं कर सकती.. अंकित को मैं बचपन से जानती हूँ उसके अलावा मैं किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती…… फिर मैंने धमकाया भी कि तब तुम्हें हमलोगों से रिश्ता तोड़ना पड़ेगा…… फिर वो खूब रोने लगी… बोली प्लीज मम्मी मैं किसी को भी छोड़ना नहीं चाहती….. अंकित यदि छोटी जाति में पैदा हुआ है तो इसमें उसकी क्या गलती है….. उससे कम औकात वाले करोड़ों रुपये दहेज में मांगते हैं और उसको भी उसके स्वजातिय दहेज के साथ-साथ लड़की भी देंगे ही “आखिर उसमें कमी क्या है?
रोज धर्म परिवर्तन हो रहे हैँ फिर तो मंत्रोच्चार से छोटी जाति को ऊँची जाति में परिवर्तित करने का कोई न कोई तो उपाय भी होगा मम्मी पूछो न पंडित जी से , प्लीज मम्मी कुछ करो….!
मैं सोंचने लगी सही ही तो कह रही है स्नेहा…! बालिग है… आत्मनिर्भर है….तो क्या अपना जीवन साथी खुद नहीं चुन सकती ….. क्या ये लोग स्नेहा से रिश्ता खत्म कर लेंगे तो इज्जत बढ़ जाएगी …?.. क्यों नहीं ये लोग समाज को एक दिशा दे देते हैं…… इतना ज्यादा पढ़ा लिखा कर….. फिर पुरानी सोंच की जंजीरों में क्यों जकड़े हुए हैं…………… अरे लोगों का क्या कुछ दिन मनोरंजन कर खुद ही चुप हो जाएंगे………. वैसी इज्जत किस काम की जो बच्चों की खुशियों के कब्र पर बनी हो….!
और मुझसे रहा नहीं गया और मैं बोल ही दी……देखो नीलम गलती स्नेहा की नहीं तुम लोगों की सोंच में है……. एक तरफ तुम लोग चाहती हो बच्चे जमाने के साथ कदम मिलाकर चलें और दूसरी तरफ़ पुरानी घिसी-पिटी परम्पराओं को स्वयं तो ढो ही रही हो और साथ में चाहती हो बच्चे भी ढोएं ?
यदि हम वर्ण विभाजन की तह तक जायेंगे तो ये पायेंगे कि विभाजन कर्म के आधार पर हुआ था “इस हिसाब से तो स्नेहा और अंकित स्वजातिय हुए न? क्योंकि वे दोनों एक ही कम्पनी में कार्यरत हैं…… अपनी जाति में विवाह का प्रावधान इसलिए था कि किसी अन्य जाति धर्म वाले घरों में लड़कियों को सामंजस्य स्थापित करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ….!
तबतक आंटी ( नीलम की सास ) आ गई और मेरी बात को बीच में रोककर बोलने लगीं..किरण तुम भी कइसन बात करने लगी “और करोगी काहे नहीं…. खुद की बेटी होत तो पता चलत…
हमलोगन बहुते इज्जत कमाए हैं..जब इज्जते नाहीं बची त जिनगी काहे की…?
मैंने आंटी को समझाते हुए” आँटी ऐसा मत कहिए ऐसे में ही बच्चे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं !
आंटी अपना सिर पीटते हुए ” भले मर भी जात त भला होत कम से कम इज्जत त बच जात……!
और मैं इज्जत की गुत्थी को सुलझाने में खुद ही उलझ गई थी और ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि दें!

5 विचार “इज्जत&rdquo पर;

  1. पिंगबैक: इज्जत – जयोति कलश

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