टाइम है मम्मी


जॉब के बाद ऋषि पहली बार घर आ रहा था..!कुछ छःमहीने ही हुए होंगे किन्तु लग रहा था कि छः वर्षों के बाद आ रहा है ऋषि घर ! बैंगलोर से आने वाली फ्लाइट पटना में ग्यारह बजे लैंड करने वाली थी.पर मेरे पति को रात भर नींद नहीं आई ! ! कई बार ऋषि से बात करते रहे कब चलोगे.. थोड़ा जल्दी ही घर से निकलना..सड़क जाम भी हो सकती है……हाँ आई कार्ड लेना मत भूलना.. आदि आदि..और उधर से ऋषि की आवाज़ आती पापा अब मैं बच्चा नहीं रहा… आप अभी तक मुझे बच्चों की ही तरह ही ट्रीट कर रहे हैं “अभी आराम से सोइये ना आप..और पति देव मोवाइल रख कर टीवी पर न्यूज वगैरह में अपने को उलझाने लगे थे, उस समय तो उनका वश चलता तो रात भर एयरपोर्ट पर ही जाकर बैठे रहते…. उनकी इस बेचैनी को देखते हुए मैंने थोड़ा चुटकी लेते हुए ही उनसे कहा चले जाइए ना रात में ही एयरपोर्ट..फिर वे सोने की कोशिश करते ” लेकिन नींद आये तब तो सोते..इधर उधर के खटर पटर से मैं भी ठीक से नहीं सो पायी थी..!


मैं तो वैसे भी बच्चों के घर आने पर उनकी पसंद की डिशेज बनाती ही रहती हूँ सो बनाई ही थी किन्तु शायद पिता के मन को माता से प्रतिस्पर्धा थी या फिर पुत्र प्रेम की अधिकता वश बाजार से ढेर सारे फल और मिठाइयाँ घर में लाकर भर दिये जिसे मैंने बड़ी मुश्किल से फ्रीज में रख पाई…. मैनें फिर चुटकी ले ही ली कि अरे “बस इतना ही” आज तो आपको पूरा बाजार ही घर में उठा कर लाना चाहिए था ..!
पतिदेव मेरी बात को अनसुना करते हुए
एयरपोर्ट के लिए निकल गये , जबकि एयरपोर्ट घर से तीन चार किलोमीटर ही दूर है और जाने में टाइम भी पांच से दस मिनट ही लगता है … पर पतिदेव नौ बजे ही एयरपोर्ट चले गए… अब इस बार मैने उन्हें टोकना उचित नहीं समझा क्यों कि मैं भी माँ हूं और पिता के हृदय की विकलता को समझ सकती थी…बल्कि मुझे तो यह सब देखकर ऐसा लग रहा था कि पिता को पुत्र मोह माता से भी अधिक होता है!
मैं घर का मेन गेट खुला छोड़ कर किचेन में कुछ – कुछ बनाने के लिए चली गयी थी शायद इसीलिए मुझे उनके आने की आहट तक नहीं सुनाई दी “ऋषि किचेन में ही आकर मेरा पैर छूने के बाद जो मैंने उसके लिए ब्राउन बनाई थी उसमे से एक टुकड़ा उठा लिया और खाते हुए ही अपने स्वभावानुसार सबसे पहले फ्रिज खोलकर उसका निरीक्षण किया जो कि उसकी बचपन की ही आदत थी , और फिर कुछ मिठाइयाँ, कोल्ड्रिंक्स का बॉटल आदि निकाल कर अपने रूम में चला गया !
रूम में से कुछ ही देर बाद बाहर आकर टेबल पर ढेर सारा गिफ्ट फैला दिया, जिसमें मेरे लिए टैब्लेट, अपने पापा के और चाचा के लिए घड़ी, भाई के लिए मोवाइल आदि थी ! यह सब देखकर पतिदेव के मुह से निकल ही पड़ा क्या जरूरत थी बेटा इतना खर्च करने की लेकिन मैं उनके चेहरे की खुशियों को अच्छी तरह से पढ़ पा रही थी ठीक वैसी ही खुशी जो कभी ऋषि के चेहरे पर देखने को मिलती थी जब हम उसे कोई सरप्राइज गिफ्ट लाकर दिया करते थे !
खैर खुश तो मैं भी बहुत थी क्योंकि मेरे लिए जो टैबलेट लाया था, खुशी के साथ-साथ मैं भी कुछ शिकायती लहजे में बोलने से नहीं चूकी कि बेटा इतना महंगा टैबलेट लाने से बेहतर था अंगूठी वगैरह ले लेते कि………खैर खुश तो थी ही तबतक देवर का काॅल भी आ गया टैबलेट पर…. तो मैने बात करते हुए ही कहा मैं टैबलेट से बात कर रही हूँ….. उन्होंने कहा टैब्लेट से बात….. ओह अच्छा,, चलिए बहुत खुशी की बात है…. फिर मैंने बताया और आपके लिए घड़ी भी लाया है..!
कुछ देर बाद देवरानी का काॅल आया… उसे इतनी हँसी आ रही थी कि कुछ देर तक हँसती रही…. फिर बताई आपको पता है ये मुझसे पूछ रहे थे कि टैबलेट क्या होता है…. जब मैंने बताया तो वे बोले कि मैं तो समझा कि ऋषि कोई ऐसी दवा लाया है कि भाभी कितना भी बात करेंगी थकेंगी नहीं..इतना सुनकर तो मैं भी हँस हँस कर लोट पोट होने लगी और सभी को बताई तो सभी का हँस हँस कर बुरा हाल हो रहा था!
दोनों बाप बेटे साथ ही खाना खाये…. बीच बीच में पतिदेव द्वारा बेटे के प्लेट में सर्व करते हुए… बेटा ये लो न बहुत टेस्टी है…. अरे ये चखो न…उस दिन तो बेटे से बात करते – करते इतनी देर हो गई कि पतिदेव आॅफिस भी नहीं गए…. पिता पुत्र बात कर रहे थे “बात क्या पिता आज एक अच्छे श्रोता की तरह सुन रहे थे और पुत्र किसी उच्च कोटि के वक्ता की तरह अपना वक्तव्य दे रहे थे… और मैं स्मृति वन में विचरण करने लगी……
जब ऋषि सेमेस्टर एग्जाम के बाद छुट्टियों में घर आता था…. प्रतीक्षा तो तब भी इतनी ही तिब्रता से करते थे ऋषि के पिता………. तब भी परिस्थितियाँ कुछ ऐसी ही होती थीं.. फल और मिठाइयों से घर तब भी भरा रहता था …अब और तब में अन्तर सिर्फ इतना ही रहता था कि बेटे के आते ही शुरू हो जाता था पिता के प्रश्नों की लड़ियाँ और उसके बाद उपदेश …. एग्जाम कैसा गया ? …. मेहनत से ही सफलता मिलती है.!
सक्सेस का एक ही मूलमंत्र है..मेहनत ,मेहनत और मेहनत..!
इतना सुनते ही ऋषि का हर बार एक ही उत्तर होता था… पापा मेहनत करने वाले जिन्दगी भर मेहनत करते रह जाते हैं और दिमाग वाले हमेशा ही आगे कुछ नया कर मेहनत करने वालों पर राज किया करते हैं… जरूरत सिर्फ मेहनत की ही नहीं होती बल्कि जरूर होती है कि मेहनत अपनी अभिरुचि के अनुसार सही दिशा में की जाये…उदाहरण के तौर पर देख लीजिए मेहनत मजदूर करते हैं और गरीब के गरीब रह जाते हैं… और उन्हीं मजदूरों पर राज ठेकेदार करते हैं और अमीर बन जाते हैं …..!इसके बाद होने लगती थी दोनों अधिवक्ताओं में में गर्मागर्म बहस “तब मैं न्यायधीश की भूमिका में आ जाया करती थी.!
उसके बाद ऋषि को अकेले में समझाने लगती थी कि बेटा क्यों नहीं सुन लेते हो पापा की बात चुपचाप,,, सही ही तो कहते हैं , बड़ों की बात मान लेना चाहिए…!
इस पर ऋषि कहता था कि मम्मी ओबेडियेंट लोग अच्छे होते हैं लेकिन जितने भी महान लोग हुए हैं वे अपने मन की ही किये हैं..
जरूरी नहीं है कि बड़ों की हर बात सही ही हो …..
फिर कहने लगता मम्मी व्यक्ति को जिस विषय में इंट्रेस्ट हो वही चुनकर उसमें काम करेगा तो काम “काम न लगकर एक खेल लगने लगेगा… जैसे आप अपना ही ले लीजिये, जैसे आपको लिखने में इंट्रेस्ट है तो आपको कविता या कहानी लिखने में मजा आता है इसमें आपको खुशी भी मिलती है, इसमें आपको अधिक एफर्ट लगाने की भी जरूरत नहीं पड़ती होगी…. लेकिन यही सब उन्हें लिखने को दे दिया जाये जिन्हें लिखने में इंट्रेस्ट नहीं है तो उन्हें यही काम मुश्किल लगेगा और हो सकता है कि महीनों लगा दे फिर भी कोई कविता या कहानी नहीं लिख पायें..
लोग परेशान इसलिए रहते हैं कि वे अपने कैरियर बनाने के लिए विषय का चुनाव अपनी इंट्रेस्ट के हिसाब से न कर के अपने पेरेंट्स के सपनों को पूरा करने के लिए उनके द्वारा थोपे गए सब्जेक्ट्स चूनते हैं…इसीलिए उन्हें अपना काम उबाऊ लगने लगता है और विशेष मेहनत की आवश्यकता पड़ती है..!
खैर बात तो उसकी सही ही रहती थी इसलिए उसपर मुझे विश्वास भी रहता था कि अच्छा करेगा ही….लेकिन पिता तो पिता ही होते हैं न… उनकी डिक्सनरी में फिजूल बातें नहीं रहतीं हैं.. उन्हें तो रिजल्ट चाहिए होता है… और किसी भी कीमत पर सफलता…
सबसे परेशानी तो ऋषि के रात में जगने वाली आदत से होती थी…ऋषि रातभर लैपटॉप पर गेम खेलता था “उसका कहना था कि अभी तो छुट्टियाँ हैं घर में कुछ दिनों तक तो मन मर्जी करने दिया कीजिये… फिर तो काॅलेज जाकर पढ़ना ही है , मैं सहमत तो हो जाती थी लेकिन इतना कह ही देती थी कि बेटा तुम लोग निशाचर हो गये हो” अरे रात में आराम से सोना चाहिए जो खेलना कूदना है दिन में करते ..और रात में खाने के लिए ऋषि के पसंद का स्नैक्स और पानी का बोतल उसके रूम में रख कर सोने चली जाती थी ..! कभी-कभी तो रात में पतिदेव के जोर – जोर से आवाज सुनकर उठ जाती थी…क्यों कि नीरव निशा में तो हल्की ध्वनि भी शोर लगती है !
पतिदेव ऋषि से –रात रात भर कम्प्यूटर पर क्या करते हो ,
ये कौन सा रुटीन है तुम्हारा..?
क्या तुम्हारे लिए कोई कम्पनी रात में खुली रहेगी कौन सी कम्पनी तुम्हे काम करने के लिए लिए रात में खुली रहेगी…?
टाइम मैनेजमेंट सीखो वर्ना……………..
जबतक अपना रुटीन सही नहीं रखोगे तब तक लाइफ में कुछ भी नहीं कर सकोगे …..आदि आदि….. तब शान्ति स्थापना हेतु मैं नाइट ड्यूटी करने लग जाती थी…!
लेकिन आज मैं कुछ चकित सी थी… शायद सूरज पश्चिम में उग आया था… ऋषि बोल रहा था और उसके पिता सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह सब सुन रहे थे… हाँ कभी-कभी उत्सुकता और कौतूहल वश बीच – बीच में कुछ प्रश्न अवश्य कर लिया करते थे “बिल्कुल उसी तरह जैसे कथा सुनते हुए पंडित से श्रोता कुछ पूछता है..!
एक वक्ता इतना अच्छा श्रोता बन गया मुझे खुशी के साथ साथ कुछआश्चर्य भी हो रहा था….
आखिर में मुझसे रहा नहीं गया और मैंने चुटकी लेते हुए ऋषि से कह ही दिया कि बेटा तुम्हारी घड़ी तो जादूगरनी निकली ……… और ऋषि ने भी मेरा आशय समझते हुए हँसते हुए ही हुए ही कहा.. टाइम है मम्मी….!

4 विचार “टाइम है मम्मी&rdquo पर;

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