जब तुम याद आये

बसंत का आगमन हो चुका था ! कोयल की कूक के संग बासंती बयार धीरे-धीरे गुनगुनाती हुई सम्पूर्ण वातावरण संगीतमय कर रही थी और साथ ही छू छू कर कुछ कह रही थी स्पर्श और सुगंध जानी पहचानी सी थी ऐसे में डाकिया दरवाजे की घंटी बजा कर हांथ में थमाया था एक लिफाफा जिसपर नाम भी कुछ जानी पहचानी सी ही थी ! लिफाफा खोलते ही एक खूबसूरत कवर पृष्ठ से सुसज्जित पुस्तक मेरे हांथो में थी !

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हम बात कर रहे हैं सुप्रसिद्ध लेखिका प्रियंवदा अवस्थी जी के अनमोल काव्य संग्रह जब तुम याद आये भाग (1) की जो 80 पृष्ठों में संग्रहित है ! सबसे पहले तो पुस्तक के कवर पृष्ठ पर ही लेखिका के खूबसूरत चित्र उनके नाम तथा कर्म को चरितार्थ करती है जो पाठक के मन को पहली ही नजर में अपनी तरफ आकृष्ट करने में सक्षम है !
जीवन पथ पर चलते चलते मिल जाते हैं अनेक पथिक ! कुछ साथ चलते हैं कुछ छूट जाते हैं और कुछ आगे निकल जाते हैं तथा कुछ हमारे स्मृति पटल पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं जिनकी स्मृतियाँ हमारे अन्तर्मन में अंकित हो जाती हैं ! उन मधुर स्मृतियों में कभी मिलन की खुशी से मन मयूर नर्तन करने लगता है तो कभी बिछुड़ने की विरह वेदना स्मृति पटल पर कुंडली मारे सर्प की तरह व्याघात करती रहती हैं ! तब उमड़ने लगती हैं भावनाएँ छलक पड़ते हैं नयनों से अश्रुधार कभी खुशी में तो कभी गम में भी जिसमें संवेदनशील कविताकारा अपनी लेखनी को डुबोकर अपनी संवेदनाओं को आकार देने की सराहनीय कोशिश की हैं तथा स्मृतियों को पन्नों पर उतारते हुए गढ़ दी हैं काव्य श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही भाव को बहुत ही कुशलता पूर्वक !
जैसा कि लेखिका ने अपनी बात में ही बताई कि वर्षो बाद उनकी लेखनी चल पड़ी और काव्य ने श्रृंगार ओढ़ लिया ! सच में कविता पढ़ते हुए उन भावनाओं के सागर में मन डूब जाता है और एक अलग ही आनंद का संचार करता है !
संकलन की पहली ही कविता पढ़कर लेखिका के भाव तथा शब्द संयोजन उनके विदूषी होने को प्रमाणित करता है !

एक बार फिर
उससे हुआ मेरा सामना
और इस बार
मैने कहा – शिव
उसने कहा – सुन्दर
मैनें कहा – शक्ति
उसने कहा – श्रेष्ठ
अब मैनें कहा – सत्य
उसने कहा – सृष्टि

संवेदनशील मन तो हमेशा ही कुछ न कुछ गढ़ता ही रहता है यूँ ही कभी-कभी जैसा कि बहुत ही सहज भाव से लेखिका ने अपनी एक कविता में कहा है !

मैं तो यूँ ही बेवक्त और बेबात लिखा करती हूँ
जेहन में उतर गये खयालात लिखा करती हूँ

लेखिका प्रीत रंग में इतनी रंग गई हैं कि उन्हें सिर्फ प्रीत का ही रंग सच्चा और बाकी रंग कच्चा लगता है……
सांचा रंग मोरी प्रीत
रंग सबरे हैं कांचे
पियु आ जाओ अब देश
चुनर फागुन रंग राचे

लेखिका के रचनाओं में सम्पूर्ण समर्पण का भाव देखने को मिलता है ! उन्हें प्रेम में चोट भी सहर्ष स्वीकार है उनका कोमल मन अचानक सशक्त होकर पीर सहने को तैयार हो जाता है जो प्रेम में अक्सर ही उपहार स्वरूप मिल ही जाता है !
करो चोट देखूं
कि अब और कितनी
इस पीर की और
चरम है कहाँ तक
तो कहीं प्रतीक्षा में विकल हो जाती हैं और कहती हैं
तुमसे ये दूरी सही नहीं जाती
और पास होते तो कही नहीं जाती

कहीं पर खूबसूरत सी गुजारिश करती हैं
नहीं चाहिये मुझे मोक्ष…
तुम्हारे प्रेम से
आजाद कर देना मुझे
इस हवा की तरह
जिसमें घुलकर मैं रच बस जाऊँ
हर उस पगडंडी पर
जहाँ जहाँ तुम अपने पांव रखो

वे प्रीतम से कहती हैं
बांधों ऐसी डोर नयन की
प्रीत पतंग गगन झूमे
अरमानों के पंख लगा हम
धरती और गगन चूमे

लेखिका भारतीय संस्कृति और सभ्यता को अपनी कविताओं में जीती हुई अपने प्रीतम को ही ईश्वर मानती हैं और कहती हैं
मंदिर मंदिर क्यों भटकूं
जब तुम हृदय विराजे
रग रग तन्मय प्रेम तुम्हारे
भाल तुम्हीं हो साजै

उनकी कविताओं में सम्पूर्ण समर्पण का भाव तो दिखता ही है साथ ही अपने स्त्री के सहनशक्ति का गर्व भी दिखाई देता है ! वो दिखाती हैं कि हम भी उसी धरा की संतान हैं जहाँ माता सीता जैसी पूजनीया ने जन्म लिया था !
वो कहती हैं
सहती रहूंगी मैं अथक निश्छल
युगों युगों तक
नियति है मेरी
कदाचित् प्रकृति भी
और कभी-कभी जीवन के थपेड़ों को सहते सहते परेशान हो जाती हैं तो माँ की याद आ जाती है और फिर लिखती हैं
आज झूला झुलाओ न माँ
मुझको पहलू सुलाओ न माँ
क्यूँ थकी जा रही है दुलारी

और फिर साहस बटोर कर नव आशा की किरणें उनकी आँखों में दिखाई देती हैं और कहती हैं
वो चमक उठी आँखों आँखों में
और मुस्काई
एक व्यंगात्म चेतना के साथ
बालों को झटके बोली
उम्मीद बटोरती हूँ
बोलो खरीदोगे…?

कुल मिलाकर श्रृंगार रस में भीगी इस संग्रह की रचनाएँ पाठकों के मन को भी पूरी तरह भिगो देती हैं इसलिए हम कह सकते हैं कि यह एक पठनीय एवं संग्रहणीय काव्य संग्रह है जिसका मूल्य भी मात्र ( 110 रूपये ) पृष्ठ के हिसाब से बिल्कुल सही है!

जब तुम याद आये भाग – ( 1 )
लेखिका – प्रियंवदा अवस्थी
प्रकाशक – रत्नाकर प्रकाशन, इलाहाबाद

किरण सिंह

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