पलकों में ही अश्रु संजोकर

पलकों में ही अश्रु संजोकर पीना सीख लिया ,
रोते – रोते हँसकर मैंने जीना सीख लिया,

सबकी खुशियों में सुन मैंने भूलकर अपनी खुशी ,
हर खुशियों में खुशी – खुशी खुश होना सीख लिया |

बहुत मिले हैं फूल पथ पर बहुत चुभे हैं शूल ,
चलकर मैंने सम्हल – सम्हल करीना सीख लिया |

बात हमारी हम तक रहे चाहा है हम दोनो ने,
इसीलिये अधरों को मैंने सीना सीख लिया |

उमड़ी उर में प्रीत तभी बही भावना सरिता ,
डूब-डूब कर मैंने भी डुबोना सीख लिया |

जब – जब उमड़ी भावना लिखा मैंने गीत गज़ल,
यूँ ही चुन-चुन शब्द सुमन पिरोना सीख लिया |

7 विचार “पलकों में ही अश्रु संजोकर&rdquo पर;

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