उड़ी रे मैं पतंग

उड़ी रे मैं पतंग लहराती हुई ,
अपने सौभाग्य पर इतराती हुई |

पिया के हाथ में डोर छोड़ चली,
प्रेम में प्रेम को आजमाती हुई |

हवाओं के रूख की पहचान नहीं ,
यूँ ही उड़ने लगी घबराती हुई |

मिल गयी जो नज़र सजना से मेरी ,
झुक गयी धीरे से शरमाती हुई |

प्रीत की जीत पर नृत्य करने लगी,
लचके है कमरिया बल खाती हुई |

देख ली मैं गगन मन हो गया मगन,
चली आई मैं घर मुस्कुराती हुई |

उड़ी रे मैं पतंग&rdquo पर एक विचार;

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