मन व्याकुल जब

मन व्याकुल जब भी होता वह बहला देता है |
स्निग्ध स्नेह से छूकर उर को सहला देता है |
वेदनाएँ बन ज्वाला जब – जब छूती हैं मुझे ,
वृष्टि प्रेम का कर वो अन्तः को नहला देता है ||

©किरण सिंह

4 विचार “मन व्याकुल जब&rdquo पर;

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