आसमान में उड़ने को प्रिय

आसमान में उड़ने को प्रिय ,
मन मेरा भी मचल रहा है |
मनमौजी इस मन को कैसे ,
समझाऊँ जो चपल रहा है ||

चलो गगन में प्रियवर हम तुम ,
दोनों संग संग उड़ जायें |
खुलकर मन की बतिया कह कर,
दोनों आपस में हरसायें ||

मगर वचन तुम इतना देदो,
साथ मेरा नहीं छोड़ोगे |
कसमें खाईं हैं जो हमने ,
तुम कभी न उसको तोड़ोगे ||

मैं भी करती हूँ प्रण सुन लो,
तुम्हें लिखूंगी तुम्हें पढूंगी |
चाहे जितना उड़ लूँ लेकिन,
अपनी जमी नहीं भूलूंगी ||

किरण सिंह

2 विचार “आसमान में उड़ने को प्रिय&rdquo पर;

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