भारतीय_नारी_की_दशा

यह आलेख आज से चौंतीस वर्ष पूर्व मैंने लिखी थी ।

नारी की दशा हमारे देश में आदिकाल से ही सोचनीय रही है। पुरुष ने तो हमेशा ही नारी की उपेक्षा की है।
नारी के गौरव और प्रतिष्ठा के सबसे बड़े हिमायती मनु ने यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता कहकर भी नारी को धर्म शास्त्र सुनने का अधिकार नहीं दिया। महाकवि तुलसीदास ने भी

ढोल, गँवार, शुद्र, पशु, नारी।
ये सब तारन के अधिकारी

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हर – हर महादेव

अंडधर , हर – हर महादेव, कृपा कर |
इंदुशेखर, अंबरिश, गंगजटाधारी |

बड़े हैं अनाड़ी अंगीरागुरु , अक्षतवीर्य |
पार्वतीपति, शिव दुख हर लो हमारी |

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भगवती देवी 

हाँ भगवती देवी बिल्कुल सटीक नाम है उनका क्यों कि कहाँ बोलतीं हैं भगवती देवियाँ , कहाँ सोचतीं हैं भगवती, कहाँ रोती हैं , देवियाँ! उन्हें तो ज़रा सा अक्षत, फूल, माला, फल, मिठाई चढ़ा दो , खा लो , और फिर बाँट दो उन्हें तो प्रसन्न होकर आशिर्वाद देना ही है क्यों कि वह देवी जो ठहरीं ! अपना धर्म तो निभाना ही होगा उन्हें साथ ही अपने नाम तथा यश कीर्ति का खयाल भी रखना होगा !

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सर पटकने से पत्थर पिघलता नहीं।

सर पटकने से पत्थर पिघलता नहीं।
लिखा किस्मत का टाले से टलता नहीं।।

लग गया हो अगर इश्क का रोग तो,
लाख कर लो जतन दिल बहलता नहीं।

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