आसमान चाहिए

मैं समझती हूँ
तुम्हारे भावनाओं को
तब से
जब से तुमने पूर्ण विश्वास के साथ
मुझे सौप दिये थे
अपना घर ,परिवार
और मैं

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चूड़ियाँ

कितनी मधुर होती हैं
चूड़ियों की खनकार
जिनके मधुर संगीत
मंत्रमुग्ध कर देती हैं
साजन को
खींच लेती हैं उनके
मन की डोर

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बारिश की बूँदें

बारिश की बूंदों ने फिर से, जगा दिया अरमां दिल के।
कर लूँ मैं कुछ बातें मन की, चुपके से उनसे मिल के।
भीग गया सारा जग लेकिन, सूखा सा है मेरा मन।
मुश्किल लगता है अब रहना, अधरों को अपने सिल के।।

जीवन का सत्य

अरे – अरे यह मैं कहाँ आ गई? अपनी हमउम्र श्याम वर्णा तराशे हुए नैन नक्श वाली साध्वी को अपनी खाट के बगल में काठ की कुर्सी पर बैठे हुए देखकर मीना कुछ घबराई हुई सी उससे पूछ बैठी। साध्वी वृक्ष के तना के समान अपनी खुरदुरी हथेली उसके सर पर फेरती हुई बोली बहन घबराओ नहीं तुम सुरक्षित स्थान पर आ गई हो।

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डाॅ सीताबो बाई

सिताबो बाई

युग चाहे कोई भी हो सीता को तो अग्नि परीक्षा से गुजरना ही पड़ता है। क्योंकि आँसू, प्रेम और बलिदान से इतिहास लिखती हुई पुरुषों को श्रेष्ठ बताने वाली स्त्री ही भारतीय संस्कृति तथा परम्पराओं के मानकों पर खरी उतरती है। ऐसे में रीतियों की बेड़ियों में जकड़ना ही स्त्रियाँ अपनी किस्मत मान कर उसे तोड़ने का साहस नहीं जुटा पातीं। क्योंकि उन्हें लक्षमण रेखा को लांघने का परिणाम पता होता है।

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बड़ी बहु

वैसे तो हम शहर में रहते थे लेकिन हमारी गर्मी की छुट्टियाँ हमेशा ही नानी या दादी के घर यानि गाँवों में बीतती थीं । मैं जब भी गाँव जाती तो वहाँ के सभी छोटे – बड़े ममेरे – चचेरे भाई – बहन मुझे घेर लेते और मैं उस छोटी सी सेना की सेनापति बनकर कभी कभी कित – कित तो कभी अन्त्यक्षरी या या फिर आइस – पाइस खेलती। गाँव के सभी भाई बहन बहुत मुझे प्यार करते थे इसलिए जब मैं वापस आने लगती थी तो सभी बहुत रोते थे।

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