चलो माँ का श्रृंगार करें

श्रद्धा सुमन हृदय से चुनकर

गूंथ माँ को अर्पित पुष्प हार करें

चलो माँ का श्रृंगार करें

टांक सितारा चुनरी लाई हूँ

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दर्द पी लूंगी आहें भरूंगी नहीं,

दर्द पी लूंगी आहें भरूंगी नहीं,
जिंदगी से शिकायत करूंगी नहीं |

दूर रह कर भी खुश हो अगर मुझसे तुम,
लौट आने को फिर मैं कहूँगी नहीं

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अदृश्य हमसफर

प्रेम एक ऐसी खूबसूरत भावना है जो कभी भी किसी के लिए भी अचानक जागृत होकर उसके हृदय के तार को झंकृत कर जीवन को संगीतमय कर देती है! तूलिका प्रिय – प्रियतमा मन कैनवास पर प्रीत का रंग भर देतीं हैं जिसकी खूबसूरती प्रिय तथा प्रियतमा की नज़रें ही देख सकतीं हैं, हृदय महसूस कर सकता है, मन बावरा हो जाता है ! किन्तु विडम्बना यह है कि इतने खूबसूरत भाव को समाज की नजरों से छुपाना पड़ता है प्रेमी – प्रेमिकाओं को क्यों कि समाज की नजरों में सदियों से प्रेम एक गुनाह रहा है जिसकी सजा सदियों से प्रेमी प्रेमिका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भुगतते आ रहे हैं!

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जीवित पुत्रिका व्रत कथा

जीवित पुत्रिका व्रत अनु्ष्ठान काशी ही नहीं वरन पूर्वांचल का बड़ा और अहम् पर्व माना जाता है। काशी में महालक्ष्मी दरबार के सानिध्य में तो सर्वाधिक पूजनार्थी जुटते हैं, इसके अलावा ईश्वरगंगी, शंकुल धारा तालाब, मंडुवाडीह बाजार सहित सभी कुंडों व तालाबों पर आज के दिन सूर्य के अस्त होते समय व्रती महिलाएं जुटती हैं। गंगा तट पर भी व्रती महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि इस जीवित पुत्रिका व्रत पर्व को पूरी आस्था और धर्मग्रंथों में वर्णित रीति रिवाज के अनुसार व्रत व पूजन करने से कुल की वृद्धि होती है। पुत्र-पौत्रादि को दीर्घायु प्राप्त होती है।

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